इस प्रकार पदार्थावस्था का स्वरूप और आचरण नित्य प्रकाशमान है। इस सबको मानव ही समझने योग्य इकाई है। प्राणावस्था की सभी वनस्पतियों के अस्तित्व पुष्टि सहित सारक-मारक आचरण को मानव किसी न किसी रूप में पहचानता है पहचान सकता है।
मनुष्येतर जीवों को अस्तित्व, पुष्टि, आशा सहित वंशानुषंगीय आचरण के रूप में मानव ने देखा है और उक्त तीनों अवस्थाओं में पाये जाने वाले आचरण के प्रति मानव विश्वास करता है। इसी के साथ-साथ यह भी निष्कर्ष मानव पाता है कि, मनुष्येतर सभी संसार अपने आचरण रूपी फलन तथा उसकी निरंतरता के प्रति आश्वस्त रहता है। इसी क्रम में मानव, मानव सहज आचरण को पहचानने में अभी तक विचाराधीन है। आदर्शवादी विधि से मानव का आचरण सुनिश्चित रहना नहीं हुआ।
सुदूर विगत से अब तक किए गए दो प्रकार के चिंतन भौतिकवादी चिंतन और आदर्शवादी चिंतन पर जितने भी प्रयत्न और प्रयोग मानव कर पाया, इसके फलन में निश्चय रूप में मानवीय आचरण, शिक्षा-संस्कार और कार्य, न्याय विधान परम्परा में प्रमाणित नहीं हो पाया। इसलिए मानवीय आचरण का अनुसंधान एक आवश्यकीय मुद्दा बना ही रहा। इसी क्रम में मानव सहज बहुआयामी अभिव्यक्ति सहज आचरण को मानवीयतापूर्ण आचरण के रूप में पहचानना मानव कुल के लिए एक आवश्यकता रही।
प्रत्येक मानव का बहुआयामी, प्रवर्तनशील, कार्यशील, विचारशील और मूल्यांकनशील होना पाया जाता है। इतनी ही नहीं कल्पनाशील, कर्म स्वतंत्र, अध्ययनशील, विश्लेषण और तुलनशील होना पाया जाता है। इन सभी प्रवर्तन, विचार, व्यवहार, कार्यों में कोई उद्देश्य भी होता है। इस प्रकार मानव की प्रवर्तनशीलता, उद्देश्यों के आधार पर सफलता-विफलताओं को आंकलित करना, पुन: सफलता के लिए प्रयत्नशील होना, मानव कुल प्रतिष्ठा के रूप में वैभव देखने को मिलता है। इस क्रम में मानव का निश्चित आचरण अथवा सार्वभौम आचरण (सभी स्वीकार सकें ऐसा आचरण अथवा सभी में कोई आचरण समान रूप से वर्तता हो) को पहचानने का भी प्रयास रहा है। इन्हीं विधियों से, इन्हीं तमाम प्रवर्तनों को, भौतिकवादी विधि से शरीर संवेदनाओं को आधार मानते हुए जब मानव में मानसिकता का विश्लेषण किया गया तब कामुकता आधार बना। कामुकता को सफल बनाने के लिए बाकी सभी प्रवर्तनों को एक आवश्यकता माना गया, जिससे कामोन्मादिता प्रोत्साहित हुईं। इसे कुछ लोग गौरव सहित