स्वीकारते भी रहे, कुछ लोग अस्वीकारते भी रहे। यह प्रतिपादन विशेषकर भौतिकवादी चिंतन के आधार पर रहा है।

भौतिकवादी चिंतन ज्ञान ह्रास विधि का आकलन होने के कारण कामोन्मादी मनोविज्ञान भी मानव कुल के लिए ह्रास का कारण बना जिसके परिणाम स्वरूप भोगोन्माद, लाभोन्माद-शोषण, द्रोह-विद्रोह और युद्ध मानसिकता बनते आया।

ऐसे कामोन्मादी मनोविज्ञान को लाभोन्माद के लिए बुद्धिजीवियों (केवल भाषा के आधार पर जीने की इच्छा रखने वालों) ने, विभिन्न प्रकार से प्रौद्योगिकीय व्यवस्था (इंडस्ट्रियल मैनेजमेंट) द्वारा अनेक प्रकार से प्रयास किया। सभी प्रयासों का अंतिम सार अभी तक यह निकला- (1) ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कम से कम आदमियों द्वारा (2) अधिक से अधिक लाभ, कम से कम खर्च (3) अच्छी से अच्छी गुणवत्ता, कम से कम निरर्थकता (वेस्टेज)। इन मुद्दों पर प्रौद्योगिकीय इकाईयों को प्रभावित किया। इसी के साथ-साथ लाभवादी तथ्यों को उभारने के लिए उद्योग में कार्यरत सभी व्यक्तियों की भागीदारी के मुद्दे पर भी चर्चा की गई है। इसे दो प्रकार से सोचा गया - (1) लाभ के आबंटन के आधार पर (2) उत्पादन उसकी तादात और गुणवत्ता के आधार पर। इसमें से एक पक्ष उत्पादन पर बल देते रहा, दूसरा पक्ष लाभ के आबंटन पर बल देते आया। अंतिम बात यह है कि अभी तक भय और प्रलोभन के चक्र से प्रौद्योगिकीय व्यवस्था मुक्त नहीं हो पाई। प्रौद्योगिकीय कार्यक्रम के आरंभ होने के पहले से ही राज्य व्यवस्था शक्ति केन्द्रित शासन के रूप में, परिवार व्यवस्थाएं व्यक्ति केन्द्रित विधियों से भय और प्रलोभन का उपयोग करते हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि परिवार से राज्य तक और एक राज्य से सम्पूर्ण राज्यों तक प्रत्येक प्रौद्योगिकीय कार्यकलाप भय और प्रलोभन से प्रभावित रहा।

रहस्यमय ईश्वर केन्द्रित चिंतन के आधार पर ईश्वरीय शासन को परम मानते आए हैं। इसीलिए ईश्वरीय भय, ईश्व के प्रतिनिधि रूपी राजा का भय, शक्ति केन्द्रित शासन का भय रहा और इसके साथ-साथ प्रलोभन जुड़ा ही रहता है। चूंकि कोई भी भय के साथ सोच नहीं पाता, कर नहीं पाता, जी नहीं पाता, फिर भी मानव विचार करते आया, काम करते आया, जीते आया। भय के साथ प्रलोभन का सहारा बना रहा तथा आस्थाओं का सहारा बना रहा। आस्थाओं का ध्रुव तीन तरीके से परिलक्षित हुआ (1) ईश्वर और ईश्वर तुल्य व्यक्तियों के प्रति (2) राजा और संविधानों के प्रति (3) गुरुजनों और विविध प्रकार के साधनाओं के प्रति आस्थाएं अर्पित होती रहीं। इन सभी के मूल में स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य की चर्चा सभी धर्म कहलाने वाली

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