आप्त वाक्य जब अध्ययनगम्य नहीं है, मान्यता के आधार पर ही है, तर्क तात्विकता की कड़ी है, अध्ययन तर्क संगत होना आवश्यक है। ऐसे में आप्त पुरूषों को भी कैसे पहचाना जाए? यह प्रश्न चिन्हाधीन रह गया। कोई भी सामान्य व्यक्ति भय, प्रलोभन और संघर्ष से त्रस्त होकर किसी को आप्त पुरूष मान लेते हैं तब उन्हीं के साथ यह दायित्व स्थापित हो जाता है आपने कैसे मान लिया। इसके उत्तर में बहुत सारे लोग मानते रहे, अथवा मैं अपने ही खुशी से मान लिया हूँ - यही सकारात्मक उत्तर मिलता है। ऐसा बिना जाने ही मान लेने के साथ ही सम्पूर्ण प्रकार से कल्याण होने का आश्वासन भी देते हैं साथ ही सारे मनोरथ या मनोकामना पूरा होने का आश्वासन देते हैं। ऐसा आश्वासन स्थली, आश्वासन देने वाला व्यक्ति के संयोग से आस्थावादी माहौल (भीड़) का होना देखा गया है। ऐसे भीड़ से कोई एक अथवा सम्पूर्ण भीड़ के द्वारा जीवन अपेक्षा, मानवापेक्षा फलीभूत होता हुआ इस सदी के अंतिम दशक तक देखने को नहीं मिला।
जहाँ तक प्रत्यक्ष की बात है ज्ञानेन्द्रिय गोचर अथवा इन्द्रिय सन्निकर्ष के नाम से इंगित कराया गया है। आँखों से अधिक कल्पना में, कल्पना से अधिक समझ में और समझ से अधिक अनुभव में आता है। इन तथ्यों को पहले स्पष्ट कर चुके हैं। अतएव आँखों में सम्पूर्ण वस्तु का प्रतिबिम्ब नहीं आता है, समझ में आता है। इस विधि से प्रत्यक्ष कोई प्रमाण होता ही नहीं है। अनुमान पूर्णतया कल्पना क्षेत्र है। अनुमान में नहीं आया हो, भविष्य में आने वाला हो ऐसे घटना को आगम भी नाम दिया गया है। अनुमान ही जब कल्पना हो गई - आगम भी कल्पना ही होगा। काल्पनिक निर्णय, प्रवृत्तियाँ, प्रयास किसी गम्य स्थली को प्रमाणित नहीं करता। इस प्रकार प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम का समीक्षा स्पष्ट हुई है। इसी के साथ आप्त वाक्य और शब्द प्रमाण का भी समीक्षा प्रस्तुत हो चुकी है। जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण विधि से अनुभव, व्यवहार और प्रयोग ही प्रमाणों के रूप में होना देखा गया है। देखने का तात्पर्य समझने से है। ये तीनों हर मानव में घटित होने वाली घटनाएं है। मानवीयतापूर्ण विधि से मानव परंपरा अभिभूत होने की स्थिति में (अभिभूत होने का तात्पर्य ओत-प्रोत होने से है) प्रत्येक मानव अपने में परीक्षण, निरीक्षण पूर्वक अनुभव को सत्यापित करना बनता है। मानवीयतापूर्ण व्यवहार, व्यवस्था में भागीदारी, आचरण का संयुक्त स्वरूप ही है। इसमें मानव का विचार शैली, अनुभव बल समाहित रहता ही है। प्रयोग कार्यों में जो कुछ भी किया जाता है विचार शैली और व्यवहार, प्रयोजन का सूत्र समाहित रहना पाया जाता है। इस सार्थक विधियों से मानवापेक्षा और जीवनापेक्षा में सार्थक होना पाया जाता है। अतएव यह स्पष्ट हो गया है कि मानव परंपरा में प्रमाण और प्रमाणीकरण का मूल स्रोत अनुभव ही है। यही विचार शैली, व्यवहार कार्य और प्रयोग कार्यों में प्रमाणित होता है। इसलिये अनुभव प्रमाण ही परम प्रमाण है, यह स्पष्ट हो जाता है। इसीलिये मानव परंपरा अनुभवमूलक विधि से ही सार्थक होना स्पष्ट हो चुकी है। अनुभव सहज अभिव्यक्ति ही दृष्टा पद एवम् प्रमाण परंपरा का प्रमाण है।