भ्रमात्मक कार्यकलापों का विस्तार है। यही परम्परा के रूप में अनुवर्ती होने की प्रेरणा देना जिसमें से स्वार्थ, पाप, अज्ञान मुक्ति धर्मगद्दियों के कार्यक्रम के रूप में और गलती को गलती से रोकना, अपराध को अपराध से रोकना और युद्ध को युद्ध से रोकना यह राजगद्दियों के कार्यक्रम के रूप में दृष्टव्य है।

धर्मगद्दियों से मोक्ष और बंधन की चर्चा हरेक पीढ़ी सुनते ही आया है। मोक्ष सर्वोपरि अथवा परम उपलब्धि अथवा परम घटना के रूप में बताते हैं। इसे बताते समय में भले ही विभिन्नता हो, हर धर्मगद्दियाँ मोक्ष को सर्वोपरि प्रतिपादित करते हैं। इसी के साथ साथ स्वर्ग-नर्क की परिकल्पना भी मानव मानस में समाहित कर चुके हैं। इस मुद्दे पर बन्धन का स्वरूप अध्ययनगम्य होने की विधि से जीवन क्रियाकलापों में भ्रमवश पीड़ित होना ही है। जीवन में ही जागृति की सम्भावना नित्य समीचीन रहता ही है। मौलिक तथ्य यही है हर मानव जागृति पूर्वक ही समाधानित होना देखा गया। ऐसा जागृति बिन्दुएँ :-

1. अस्तित्व में जागृत होने के रूप में और यह सर्वसुलभ होने के रूप में देखा गया। इसीलिये यह अनुभवात्मक अध्यात्मवाद अध्ययनगम्य होने की विधि से प्रस्तुत किया गया है।

2. अनुभव जीवन में ही, जीवन से ही, जीवन के लिये ही समीचीन है। जैसा-मानव जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में है एवम् शरीर को जीवन संचालित करता है यह दोनों तथ्य स्पष्ट हो चुकी है। जीवन ही भ्रमित अवस्था में भ्रमित रहकर बन्धन के पीड़ाओं से पीड़ित होता है। शरीर और संसार के साथ इन्द्रिय सन्निकर्ष और कल्पनापूर्वक समस्त प्रकार के अव्यवस्था का पीड़ा होना अथवा अव्यवस्था के समझ के अनुपात में पीड़ित होना देखा गया। इस तथ्य को हर मानव अपने में निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक पहचानना सहज है।

सर्वमानव पीड़ा से मुक्ति चाहता ही है। यही जागृति सहज अपेक्षा का स्रोत और सम्भावना है। जीवन सहज क्रियाकलापों में, से न्याय, धर्म, सत्य का साक्षात्कार और दृष्टा होना और उसका प्रमाण सिद्ध होना ही सम्पूर्ण जागृति है। दृष्टापद में होने वाली सम्पूर्ण क्रियाकलाप जीवन सहज विधि से जानने-मानने-पहचानने-निर्वाह करने के रूप में होना पाया गया है। जानने-मानने की सम्पूर्ण वस्तु जीवन ज्ञान, सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान ही है। अस्तित्व में अनन्त ग्रह-गोल व्यापक वस्तु में समायी हुई है - जिनका दृष्टा केवल मानव ही है। भले ही कैसे हैं, कितने है, क्या है ? इन तथ्यों का स्पष्टीकरण न हो। इसी प्रकार धरती में चारों अवस्थाओं यथा पदार्थ, प्राण, जीव व ज्ञानावस्था सहज वस्तुओं का दृष्टा भी मानव ही है। प्रकारान्तर से इन सभी चीजों को हर मानव देखता ही है। साथ-साथ हर कार्यशील वस्तुओं को व्यापक में समायी हुई देखना समझना समीचीन है। जितने भी अचल वस्तुएँ हैं वे सब धरती के साथ ही गतिशील रहना देखने को मिलता है। धरती स्वयं व्यापक में समायी हुई होना कल्पना

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