(8) सभी अपने “त्व” सहित व्यवस्था है, जो सहअस्तित्व है; क्योंकि अस्तित्व न घटता है न बढ़ता है :-
जागृति पूर्वक ही मानव व्यवस्था है और वह व्यवस्था में भागीदार होता है, यह मानव धर्म है। क्योंकि लोहा अपने लोहत्व सहित; गाय गायत्व के साथ; दूब दूबत्व के साथ व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। इसी प्रकार मानव मानवत्व के साथ व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदारी संपन्न होना ही मानव के सहअस्तित्व का प्रमाण है। सहअस्तित्व सहज रूप में ही व्यवस्था है। इस प्रकार मानव धर्म, व्यवस्था और सहअस्तित्व स्वाभाविक रूप में, अस्तित्व सहज धर्म का ही प्रकाशन है। सहअस्तित्व नाम है इसीलिए नाम से नामी का निर्देश हो जाना, संप्रेषणा की सफलता है। नामी का स्वरुप है - सभी व्यवस्था सहित वर्तमान है, जिसमें मानव का भी अविभाज्य होना समझ में आता है। इस प्रकार - “व्यवस्था एक समग्रता सहित अभिव्यक्ति है” जिसमें जागृत मानव दृष्टा सहज प्रमाण है।
(9) अस्तित्व सहज राज्य, धर्म, समाज व्यवस्था और उसकी निरंतरता की व्याख्या :-
मूलत: अस्तित्व ही वैभव है, वैभव ही राज्य है। अस्तित्व में मानव का अविभाज्य होना भी स्पष्ट हो गया है। सहअस्तित्व के रूप में ही संपूर्ण वैभव है, क्योंकि सत्ता में सभी अवस्थाएँ अविभाज्य है। इनका अलग-अलग विभाजित कर देखना संभव नहीं है। सत्ता में सभी अवस्थाएँ समाहित होना दिखाई पड़ता है। सत्ता व्यापक है। सत्ता न हो, ऐसी किसी स्थली की कल्पना भी नहीं हो सकती है। सत्ता में ही संर्पूण वस्तुओं का होना पाया जाता है अर्थात् अस्तित्व ही संपूर्ण वस्तु है। सहअस्तित्व ही मूलत: संपूर्ण अस्तित्व है। इस प्रकार समग्रता सहज अविभाज्यता का मूल सूत्र अथवा परम सूत्र सत्तामयता में संपृक्त प्रकृति ही है। इसलिए सत्ता में ही संपूर्ण अवस्थाएँ नियमित, नियंत्रित, संतुलित और समाधानित रहना देखने को मिलता है । इन सभी तथ्यों में सहअस्तित्व ही परम सौंदर्य, परम सुख एवं परम समाधान और परम सत्य है। अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है। ऊपर वर्णित विश्लेषणों, निष्कर्षों के आधार पर धर्म और राज्य का मूल रूप सहअस्तित्व नित्य व्यवस्था होना ही इंगित होता है। क्योंकि सहअस्तित्व सहज कार्यकलाप और वैभव ही है संपूर्ण “त्व” सहित व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी का ताना-बाना। कोई भी अवस्था और ऐसी कोई इकाई दिखाई नहीं पड़ती है, जो इस ताना-बाना से अलग रहे। खूबी यही है कि सत्ता स्वयं अस्तित्व में अविभाज्य है।
इस प्रकार अस्तित्व अपने में संपूर्ण स्वरुप और वैभव है। यही व्यवस्था है। इसलिए मानव का स्वयं में व्यवस्था होना और व्यवस्था में भागीदारी सहज कार्य में अपने को वैभवित कर पाना ही कर्म-स्वतंत्रता