4) धर्म और राज्य में अर्न्तसंबंध
(1) धर्म गद्दी की असफलता :-
शक्ति केन्द्रित शासन रुपी राज्य और अनुग्रह, वरदान, मोक्ष जैसे आश्वासन रुपी धर्म; अनुग्रह, वरदान, मोक्ष पाने के लिए तमाम प्रकार की साधनाएँ, तप, अभ्यास जैसी बातें धर्म के रूप में देखने को मिली। हर परंपरा में जो साधना किया, उसी परंपरा का सम्मान बढ़ते गया। परंपरा में साधना का तात्पर्य समुदाय परंपरा में प्रचलित साधना के उपक्रम से है। प्रत्येक साधक जो अथक परिश्रम से तप और अभ्यास किया, जितना समय भी किया, वह सब व्यक्ति पूजा में समा गया। जबकि प्रमाण परंपरा अपेक्षित रहा, वह अभी भी प्रतीक्षित है। ऐसी कोई साधना, उपक्रम, ज्ञान, दर्शन, कर्मकाण्ड, शिक्षा, संस्कार, अभ्यास नहीं निकल पाया जो सर्वशुभ समाधान सहज हो। कम से कम अधिकांश महापुरुष, यति, सती, संत, सिद्घ, तपस्वी, योगी इस धरती में स्थित अनेक समुदाय संबंधी कटुताएँ दूर करने के पक्ष में थे। उनसे भी उन-उन समुदायों संबंधी कटुताएँ दूर नहीं हो पाई। हर समुदाय में कर्म, धर्मशास्त्र लेकर चलने वाले समुदाय, ज्यादा से ज्यादा कट्टरता का परिचय दिये। जिसको सामान्य मानव ने यंत्रणा के रूप में पाया। हर समुदाय में जो वैराग्य विधि से साधना किये, वे सर्वशुभ चाहने वालों में से रहे। किसी समुदाय में जो भक्त होते रहे वे संसार के साथ सर्वाधिक सौजन्यता को व्यक्त किये। इष्ट देव की लीलाओं को यश के रूप में गाने में और एक दूसरे के साथ कथा, वार्तालाप, सत्संग के रूप में प्रस्तुत होने से अपने को अत्यंत गौरवान्वित अनुभव करते रहे। इसी के साथ-साथ राज्य को मानने वाले भी होते रहे। राज्य के साथ और राजा के साथ उनका ध्यान समाता गया।
(2) राज्य व्यवस्था है, न कि शासन :-
अस्तित्व मूलक, मानव केन्द्रित चिंतन के आधार पर राज्य और धर्म एक नाम है। नाम के मूल में वस्तु है, यह वस्तु ही व्यवस्था है। व्यवस्था स्वयं में सहअस्तित्व है। अस्तित्व जैसा भी अभिव्यक्त है, इसका दृष्टा जागृत मानव ही है। जो अस्तित्व रुपी दृश्य दिखता है वह नियमित, नियंत्रित, संतुलित रूप में हैं। इसका संयुक्त स्वरुप व्यवस्था के रूप में वर्तमान है। हर वस्तु अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था के रूप में है अर्थात् इसका नियंत्रित, संतुलित, व्यवस्थित रूप में वर्तमान होना निरंतर स्पष्ट है।