Table of contents

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-4 मूल अवधारणाएँ -2 प्राक्कथन 1 1. समाधान और द्वन्द्व-1 7 2. मानव स्वरूप का इतिहास 22 3. समाधानात्मक भौतिकवाद 24 4. अस्तित्व एवं अस्तित्व में परमाणु का विकास 38 5. अस्तित्व में परमाणु का विकास 54 ज्ञानावस्था में पाँच मानव Subsection 55 प्रकृति सहज चार अवस्थाएं (परस्पर पूरक) Subsection 56 अस्तित्व में व्यवस्था = सहअस्तित्व Subsection 57 6. सहअस्तित्व पूरकता और व्यवस्था 94 7. संचेतना, चेतना और चैतन्य 99 8. समाज, धर्म (व्यवस्था) और राज्य 110 9. समाधानात्मक भौतिकवाद के नज़रिए में : 110 1) मौलिकता की पहचान ही निर्वाह का आधार Subsection 123 2) मानवीय आहार Subsection 134 3) मानव की मौलिकता Subsection 138 4) धर्म और राज्य में अर्न्तसंबंध Subsection 147 5) मानव की पहचान, महापुरुषों की पहचान Subsection 154 6) प्रकाशन और प्रतिबिम्ब Subsection 158 7) गुण, प्रभाव व बल Subsection 164 8) कृत्रिमता, प्रकृति और सृजनशीलता Subsection 171 9) संकरीकरण और परंपरा Subsection 177 10) उद्योग, आवश्यकता, संबंध और संतुलन Subsection 199 11) भय, प्रलोभन या मूल्य और मूल्याकंन Subsection 210 12) भौतिकता, अभिव्यक्ति, संस्कार और व्यवस्था Subsection

4) धर्म और राज्य में अर्न्तसंबंध

(1) धर्म गद्दी की असफलता :-

शक्ति केन्द्रित शासन रुपी राज्य और अनुग्रह, वरदान, मोक्ष जैसे आश्वासन रुपी धर्म; अनुग्रह, वरदान, मोक्ष पाने के लिए तमाम प्रकार की साधनाएँ, तप, अभ्यास जैसी बातें धर्म के रूप में देखने को मिली। हर परंपरा में जो साधना किया, उसी परंपरा का सम्मान बढ़ते गया। परंपरा में साधना का तात्पर्य समुदाय परंपरा में प्रचलित साधना के उपक्रम से है। प्रत्येक साधक जो अथक परिश्रम से तप और अभ्यास किया, जितना समय भी किया, वह सब व्यक्ति पूजा में समा गया। जबकि प्रमाण परंपरा अपेक्षित रहा, वह अभी भी प्रतीक्षित है। ऐसी कोई साधना, उपक्रम, ज्ञान, दर्शन, कर्मकाण्ड, शिक्षा, संस्कार, अभ्यास नहीं निकल पाया जो सर्वशुभ समाधान सहज हो। कम से कम अधिकांश महापुरुष, यति, सती, संत, सिद्घ, तपस्वी, योगी इस धरती में स्थित अनेक समुदाय संबंधी कटुताएँ दूर करने के पक्ष में थे। उनसे भी उन-उन समुदायों संबंधी कटुताएँ दूर नहीं हो पाई। हर समुदाय में कर्म, धर्मशास्त्र लेकर चलने वाले समुदाय, ज्यादा से ज्यादा कट्टरता का परिचय दिये। जिसको सामान्य मानव ने यंत्रणा के रूप में पाया। हर समुदाय में जो वैराग्य विधि से साधना किये, वे सर्वशुभ चाहने वालों में से रहे। किसी समुदाय में जो भक्त होते रहे वे संसार के साथ सर्वाधिक सौजन्यता को व्यक्त किये। इष्ट देव की लीलाओं को यश के रूप में गाने में और एक दूसरे के साथ कथा, वार्तालाप, सत्संग के रूप में प्रस्तुत होने से अपने को अत्यंत गौरवान्वित अनुभव करते रहे। इसी के साथ-साथ राज्य को मानने वाले भी होते रहे। राज्य के साथ और राजा के साथ उनका ध्यान समाता गया।

(2) राज्य व्यवस्था है, न कि शासन :-

अस्तित्व मूलक, मानव केन्द्रित चिंतन के आधार पर राज्य और धर्म एक नाम है। नाम के मूल में वस्तु है, यह वस्तु ही व्यवस्था है। व्यवस्था स्वयं में सहअस्तित्व है। अस्तित्व जैसा भी अभिव्यक्त है, इसका दृष्टा जागृत मानव ही है। जो अस्तित्व रुपी दृश्य दिखता है वह नियमित, नियंत्रित, संतुलित रूप में हैं। इसका संयुक्त स्वरुप व्यवस्था के रूप में वर्तमान है। हर वस्तु अपने ‘त्व’ सहित व्यवस्था के रूप में है अर्थात् इसका नियंत्रित, संतुलित, व्यवस्थित रूप में वर्तमान होना निरंतर स्पष्ट है।

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