Table of contents

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-4 मूल अवधारणाएँ -2 प्राक्कथन 1 1. समाधान और द्वन्द्व-1 7 2. मानव स्वरूप का इतिहास 22 3. समाधानात्मक भौतिकवाद 24 4. अस्तित्व एवं अस्तित्व में परमाणु का विकास 38 5. अस्तित्व में परमाणु का विकास 54 ज्ञानावस्था में पाँच मानव Subsection 55 प्रकृति सहज चार अवस्थाएं (परस्पर पूरक) Subsection 56 अस्तित्व में व्यवस्था = सहअस्तित्व Subsection 57 6. सहअस्तित्व पूरकता और व्यवस्था 94 7. संचेतना, चेतना और चैतन्य 99 8. समाज, धर्म (व्यवस्था) और राज्य 110 9. समाधानात्मक भौतिकवाद के नज़रिए में : 110 1) मौलिकता की पहचान ही निर्वाह का आधार Subsection 123 2) मानवीय आहार Subsection 134 3) मानव की मौलिकता Subsection 138 4) धर्म और राज्य में अर्न्तसंबंध Subsection 147 5) मानव की पहचान, महापुरुषों की पहचान Subsection 154 6) प्रकाशन और प्रतिबिम्ब Subsection 158 7) गुण, प्रभाव व बल Subsection 164 8) कृत्रिमता, प्रकृति और सृजनशीलता Subsection 171 9) संकरीकरण और परंपरा Subsection 177 10) उद्योग, आवश्यकता, संबंध और संतुलन Subsection 199 11) भय, प्रलोभन या मूल्य और मूल्याकंन Subsection 210 12) भौतिकता, अभिव्यक्ति, संस्कार और व्यवस्था Subsection

9) संकरीकरण और परंपरा

इस शताब्दी में, सकंरीकरण प्रक्रिया का कर्माभ्यास कर, मानव ने देखा जहाँ तक संकरीकरण कर विविध अंकुर प्रत्यारोपण विधि और तने का प्रत्यारोपण विधि - इन दो विधियों में फूल और फल में, दोनों में प्रयोग हुए। फल जाति में अंकुर प्रत्यारोपण और तने का प्रत्यारोपण, दोनों सफल हुए। इसमें संकर विधि भी अपनाई गई जैसे - संतरा, नारंगी, सेब, बेर आदि विधियों से उपलब्धियाँ हुई। अभी तक उनमें से अधिकांश, अपनी वंश परंपरा को बनाये रखने में सक्षम नहीं दिखाई पड़ते हैं। जैसे किसी प्रत्यारोपित विधि में आया हुआ आम वृक्ष, उसकी गुठली से उसी प्रकार का आम तैयार नहीं हुआ। आम वृक्ष की यह प्रक्रिया, बहुत पहले से भी रही। इसी प्रकार सेब, अमरूद, अनासपत्ती, आडू आदि फलों में और नींबू में देखा गया। संतरा, नींबू, अमरूद में श्रेष्ठ प्रजाति के बीज डालने पर उसी प्रजाति के फल न आने की स्थिति में, अंकुर और तने को बदलने की प्रक्रिया में मानव सफल हुआ है। तना जो प्रत्यारोपित रहता है, अंकुर जो प्रत्यारोपित रहता है, उसी में होने वाले फलों को सफल रूप में होता हुआ देखा गया।

जहाँ तक पुष्पों में जिन भी विधियों को अपनाया गया, उसमें आकार-प्रकार में वांछित स्वरुप प्रत्यारोपण रंग, रूप (आकार) प्राप्त किया गया। साथ ही यह भी देखने को मिला कि इन प्रत्यारोपण विधियों से लगी हुई पुष्पों में सुगंध की क्षति होती गई। साथ ही मकरन्द और पराग गुणवत्ता में क्षति हुई, अत: प्रत्यारोपण सफल नहीं हुआ। फलों में तो यही देखने को मिला है कि प्रत्यारोपण से प्राप्त फल और फूल अपने वंश को बना नहीं पातें है अर्थात् अपने बीजानुकूल को नहीं बना पाते हैं। पीढ़ी से पीढ़ी प्रत्यारोपण की आवश्यकता बनी रहती है। फल फूलों में यह संभव भी है।

जीव कोटि में संकरीकरण कर देखा गया। गाय और भैंस जैसे संकरीकरण से वंश को स्थापित करने की भी भूमिका में कार्य हुए। इनकी जलवायु और आहार विधियों में परतंत्रता बढ़ती गई। इसका ख्याल मानव को रखना आवश्यक हो गया। ये अपने में, अपने से प्राकृतिक विधि से अपना पेट भर सकें, अपने प्रयोजन सिद्घ कर सकें, ऐसा नहीं हुआ। इनके अंसतुलित होने की स्थिति में अर्थात् मानव जब कभी भी इनके साथ ध्यान देने में चूकता है, इनमें अंसतुलन होना देखा गया। यह भी देखा गया है कि पशु जो खेत खलिहानों में काम करते है, प्रकृति के साथ अपना पेट भर लेते है और सामान्य रोगों को अपने आहार संयम से ही स्वयं ठीक कर लेते हैं। इस प्रकार की अर्हता, संकर पशुओं में देखने को नहीं मिली। इनमें होने वाले रोग बहुत ही जटिल हो जाते हैं। ये अपने में ठीक हो नहीं पाते। इनको ठीक करने में मानव बहुत समर्थ हुआ है या नहीं, इस बात से अधिक इन पर ध्यान देना प्रधान वस्तु रहता है । इस प्रकार इन

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