(3) समृद्घि का आधार सूत्र :-
मनुष्य में श्रम नियोजन की क्षमता, सदा ही बनी रहती हैं। जीवन शक्तियाँ अक्षय है, इस कारण मानव आवश्यकता से अधिक वस्तुओं को निर्मित करने का अधिकार संपन्न है ही। मानव में अक्षय बल और अक्षय शक्ति को पहचाना जाता है, यही सूत्र मानव के समृद्घ होने का आधार है।
(4) सहअस्तित्व में अनुभव सहज समझदारी = समाधान। कृत्रिम कृषि परंपरा, कृत्रिम सड़क आदि निर्माण = निरर्थकता।
समाधान सहित ही समृद्घि का अनुभव होता है। समाधान मूलत: सहअस्तित्व सहज समझदारी है। सहअस्तित्व सहज वैभव है। अस्तित्व ही परम सत्य है। अस्तित्व सहज स्वरुप सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। इस प्रकार अस्तित्व सहज समझदारी स्वयं समाधान है, यह त्रिकालाबाध सत्य है। मानव ही समझदारी के साथ जीता है या जीना चाहता है या जीने के लिए बाध्य है क्योंकि समझदारी के बिना मानव का स्वयं को व्यक्त करना संभव नहीं है। हर मानव स्वयं को व्यक्त करना चाहता ही है। समस्या की पीड़ा से मानव पीड़ित होता है। इस ढंग से मानव समस्या को वरता नहीं है या वरना नहीं चाहता है। इन आधारों पर समाधान ही मानव का शरण, वैभव व अपेक्षा है। समाधान अस्तित्व सहज है। अस्तित्व जैसा है, वैसे ही समझने की स्थिति में समाधान ही मानव को करतल गत होता है। संपूर्ण सृजनशीलता का उपाय मानव में जो कुछ भी सूझ-बूझ से इस रूप में आया है उसका सृजन भी निश्चित प्रयोजन है, जैसे:-
कृषि कार्य - यह स्वाभाविक रूप में मानव शरीर के आहार प्राप्ति के क्रम में होना पाया जाता है। आहार संबंधी समस्याएँ समाधानित होती हैं। ऐसे समाधान के साथ ही कृषि परंपरा समृद्घ होती हैं। कृषि के साथ मानव ने भूमि संरक्षण, जल संरक्षण, बीज संरक्षण के साथ ऋतु काल संयोगों की विधियों को अर्थात् धरती, बीज संयोग विधियों को पहचाना और समृद्घ हुआ। इनमें पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था की परस्परता में और वर्तमान में विश्वास होना पाया गया।
दूसरे उदाहरण के तौर पर विविध प्रकार के मकानों को मानव ने तैयार किया। सड़क और सेतुओं को बना लिया। इनमें संयोजित सीमेन्ट लोहा के निर्माण प्रक्रिया में ईंधन संयोजन कृत्रिमता हुई। इन कृत्रिमताओं को देखने पर पता लगता है कि पदार्थावस्था (धरती) पर ही मानव का श्रम नियोजन हो पाता है। इन्हीं श्रम नियोजन के आधार पर कृत्रिमता को सृजनता के रूप में मानने के स्थान पर आ गए। इसी भ्रम के आधार पर प्रकृति पर विजय पाने की परिकल्पना तथा उमीद की गई। ये कल्पनाएँ मानव में निरर्थक सिद्ध हो गई अर्थात् यह तर्क संगत नहीं है।