न्यायिक, समाधानित, प्रामाणिकता पूर्ण परंपरा के रूप में, प्रमाणित होना ही आज की आवश्यकता है। अस्तु, मानव में जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन रुपी अपनी समझदारी में विश्वास करना ही, जागृति का शुभारंभ हैं। ऐसी समझदारी में जागृति पूर्वक मानव को अस्तित्व और सहअस्तित्व में अखण्डता को पहचानना संभव हो गया है।
यह जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान एवं मानवीयतापूर्ण आचरण पूर्वक प्रमाणित हो जाता है।
प्राण कोषाएँ कृत्रिम नहीं होते :- प्राण कोषाएँ मूलत: रसायन वैभव की देन हैं। रासायनिक द्रव्य भौतिक वस्तुओं का ही उदात्तीकृत रूप है - यह स्पष्ट हो चुका है। रासायनिक द्रव्य अपने आप में प्राकृतिक द्रव्य है। मानव भी यदि संयोग पूर्वक रासायनिक घटना को घटित करता है, वह भी प्राकृतिक ही है, क्योंकि मूल द्रव्य पदार्थावस्था का ही है चाहे ठोस हो, तरल हो या विरल हो। विभिन्न रसायनों के संयोगपूर्वक ही प्राण-कोषाओं के रूप में रासायनिक रचना अथवा रासायनिक मूल रचना कोषाओं के रूप में भी संपन्न होती है। प्राणकोषा जो ठोस रूप में रचित रहती है उसी में प्राण सूत्र रचना कार्यकारी प्रवर्तन सहित समाया रहता है। इसी क्रम में रासायनिक रसों में कोषा का आप्लावित रहना पाया जाता है। इसका तात्पर्य है कि रसायन रसों में डूबी हुई स्थिति और ऊष्मा के दबाव वश ही मूलत: रासायनिक द्रव्य से रचित प्राणकोषा श्वसन क्रिया सहित ही विपुलीकरण और रचना कार्य को संपन्न करता है। यही प्राण कोषा रचना व महिमा का तात्पर्य है। श्वसन क्रिया करता हुआ कोषा ही प्राण कोषा के नाम से ख्यात है। ऐसी प्राण कोषाएँ अपने आप विपुलीकरण अर्थात् एक कोषा से दो, ऐसे ही अनेक बन जाने की विधि प्राण कोषाओं में निहित रहती हैं। यह विपुलीकरण विधि भी रासायनिक वैभव के सहज क्रियाकलाप है।
रसायन द्रव्य तरल, विरल, ठोस रूप में है। रसायन द्रव्य विभिन्न अणुओं के संयोग से बनने वाली वस्तु है। अणुओं के मूल में परमाणुओं का होना पाया जाता है। प्रत्येक परमाणु अपने “त्व” सहित व्यवस्था सहज रूप में है। इसके आधार पर परमाणुओं के संयोग से अणु और विभिन्न अणुओं के संयोग से भी व्यवस्था स्पष्ट हो जाती है। व्यवस्था जड़-चैतन्य प्रकृति में वर्तमान सहज आचरण हैं। यही आचरण सहअस्तित्व सहज क्रम में समग्र व्यवस्था में भागीदारी है। इसी क्रम में रासायनिक द्रव्य व प्राण कोषाओं से रचित रचनाएँ सब अपनी-अपनी परंपरा सहज विधि से आचरणशील है ही। प्रत्येक इकाई का स्वयं में व्यवस्था होने का आचरण, वर्तमान में अक्षुण्णता के रूप में देखने को मिलता है, जैसे लोहे का परमाणु-अणु “लौहत्व” के साथ वर्तमानित रहना पाया जाता है। इसकी अक्षुण्णता प्रमाणित है। एक प्राण कोषा और उनसे रचित रचना अपने-अपने “त्व” सहित व्यवस्था के रूप में प्रमाणित हैं। ऐसी प्राण कोषाएँ रचना सूत्र संपन्न रहते हैं। विधिवत् रचना के लिए निश्चित सूत्र रहते ही हैं। प्राण कोषा में ही उस-उस प्रजाति के