कीटनाशक या कीट नियंत्रक कार्यों को भी कास्तकारों को अपने हाथों में बनाए रखना चाहिए जिससे पराधीनता की नौबत न आए।
धरती में अम्ल और क्षार अनुपाती विधि से समाहित होने का जो क्रम बना है, वह पाचन विधि से बना है। धरती में पाचन विधि का तात्पर्य जहाँ तक उर्वरक संवहन प्रक्रिया रहती है वहाँ तक (उतनी गहराई तक) धरती में हवा का संचार होना पाया जाता है। यही पाचन विधि का क्रम है। इस विधि से हवा से धरती को जो आवश्यक चीज है, रसायन है या वस्तु है, वह समावेश होने के क्रम में हैं। यह क्रिया अनुपाती अम्ल, क्षार आदि रसायनों के संयोग से होता है। जैसे-जैसे अम्ल, क्षार आदि रसायन अर्थात् खनिज संयोग से धरती का अर्थात् कृषि और वन का संयोग होने से धरती में अनुपाती अम्ल और क्षार संचय होना पाया जाता है, यही अनुपात से अधिक क्षार ही ऊसर (बंजर) भूमि में परिवर्तित हो जाता है जिसमें फसल की संभावना समाप्तप्राय हो जाती है।
अभी जैसा भी रासायनिक खाद और उसके मनमाने उपयोगों को देखने पर पता चलता है कि एक दो पीढ़ी के बाद धरती से कोई कुछ ले नहीं पाएगा। इसके आधार के रूप में कहीं भी इस बात को सर्वेक्षण कर सकते है कि जहाँ-जहाँ रासायनिक खाद का उपयोग हो रहा है, उस जमीन में अम्लीयता, क्षारीयता कितने प्रतिशत बढ़ गई। इसके अनुपात को ऐसे सभी खेतों में परीक्षण कर सकते है कि जब से रासायनिक खाद पड़ रहा है उसके पहले जिन-जिन खेतों की मेड़ बन चुकी है, उन खेतों के मेड़ों की मिट्टी का परीक्षण प्रयोग कर सकते हैं। वहाँ रासायनिक खाद के पहले की मिट्टी रहती ही है। उसके आधार पर अम्ल और क्षार खेतों में कितना बढ़ा है, उस अनुपात का पता लगाया जा सकता है। इससे यह भी पता लगेगा कि कितने अनुपात में रासायनिक खाद डालने से कितने दिन में अम्ल और क्षार कितना बढ़ेगा, जिससे वह ऊसर (बंजर) हो जावेगी। इन सब चीजों का आज की स्थिति में सबके लिए परीक्षण करना सुलभ हो गया है। आज की अधिकांश धारणा रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों के दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव के ऊपर अथवा प्रतिकूल प्रभाव की कल्पना के आधार पर, सुनने को मिलता है।
इन सभी अनुभवों के आधार पर अथवा सहअस्तित्व सहज आवर्तनशीलता के आधार पर देखने पर पता चलता है कि - मिट्टी के गुण, धर्म को उसकी उर्वरकता के आधार पर ही पहचाना जाता है। उर्वरकता में इन सभी द्रव्यों (रसायनों) की सम्मिलित क्रियाकलाप देखने को मिलती है कि वनस्पतियों के सभी आवश्यकीय रसायन द्रव्य, अनुपाती विधि से समाहित हैं। जिसको पाकर बीज अनेक बीजों में परिवर्तित करने योग्य द्रव्यों के रूप में पहचाना जाता है। इस प्रकार उर्वरकता का आधार उर्वरक मिट्टी और वनस्पति के संयोग से ही, धरती और हरियाली की आवर्तनशीलता में ही धरती में उर्वरकता अपने आप बढ़ती है।