यह दर्शन अपने आप में संपूर्ण आयाम, कोण, दिशा, परिप्रेक्ष्य में नैसर्गिकता, वातावरण, सम्बन्ध, संपर्क, स्थिति-गति में, मानव के भ्रमवश पैदा की हुई सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान है। इसलिए यह “समाधानात्मक भौतिकवाद” रासायनिक-भौतिक संतुलन, पूरकता सम्बन्धी तथ्यों पर सहज ही समाधान प्रस्तुत करता है। भ.व. (329-338)

जागृति मानव का गम्य स्थली है, तब तक मानव जागृति क्रम में ही गण्य हो जाता है। जागृति क्रम में निश्चयन श्र्रृंखला, जागृति श्रृंखला की प्यास ही रह पाता है, परिणामस्वरूप गम्य स्थली के लिए बाध्यता निर्मित होता ही है। सह-अस्तित्व सहज विधि से मानव के सम्मुख विविध मानव मानस और नैसर्गिक अनमेल की पीड़ा से पीड़ित हो चुकी है और नैसर्गिक परिस्थितियाँ मानव को जागृत होने के लिए, चेतने के लिए, परिवर्तित होने के लिए समझने के लिए अनुकूल परिस्थितियों को निर्मित किये जा रहा है। जबकि नैसर्गिकता और मानव प्राकृतिक स्रोत मानव की अभिलाषा के बीच विसंगतियाँ है। यही विसंगतियाँ उक्त प्रकार के सभी अंतरणों के लिए अनुकूल परिस्थिति बन चुकी हैं।

पुनःश्च हवा, पानी, धरती के रखरखाव वश इन सब में विसंगतियाँ सोचने समझने जागृत होने के लिए निर्देशित कर रहा है।

यह भी इसी के साथ निश्चित होता है कि मानव इस धरती पर जागृति पूर्वक ही जी सकता है अन्यथा सह-अस्तित्व सहज नैसर्गिकता अपने आप मानव प्रजाति को स्वर ताल भंगिमा में प्रस्तुत होना आरंभ कर दिया है। अतएव मानव प्रजाति को जागृति पूर्वक जीने की विधि, कला, उपक्रम, उपाय, शोध कार्यों को अपनाना ही होगा। इसी क्रम में अभ्युदय सहज सार्थकता को बोध कराने के उद्देश्य से ही यह श्रुति रूपी वांड्गमय मानव के लिए प्रस्तुत है। म.वि. (194-195)

Page 114 of 130