सारांश
- संग्रह का तृप्ति बिन्दु किसी भी देश काल में किसी एक व्यक्ति को भी नहीं मिल पाया।
- समृद्धि सामान्य आकांक्षा और महत्वाकांक्षा संबंधी वस्तुओं के आधार पर हो पाता है न कि प्रतीक मुद्रा के आधार पर।
- आवर्तनशील व्यवस्था में मानव सहज अपेक्षा रूपी समृद्धि सभी परिवारों के लिए समाधान सहित सुलभ हो जाता है।
- अर्थशास्त्र विधा में आवर्तनशीलता स्वयं में श्रम नियोजन और श्रम विनिमय प्रणाली, पद्धति, नीति है।
- समृद्धि का भाव परिवार में ही होता है। एक परिवार समृद्ध होने के लिए एक से अधिक परिवार का समृद्ध रहना अनिवार्य है। इस क्रम में अकेले में समृद्ध होने की कल्पना और संग्रह विधि से समृद्धि की कल्पना दोनों भ्रम सिद्ध हुआ।
- अभाव का अभाव ही समृद्धि है। अ.श. (91)
4.3 प्राकृतिक संतुलन
प्रकृति में संगीत है, संतुलन है, भ्रमित मानव ही समस्या पैदा करता है
सम्पूर्ण अस्तित्व ही पूरक विधि में सह-अस्तित्वशील होना स्वयं में आवर्तनशीलता का आधार है। मानव के हर क्रियाकलाप प्रधानत: दो विधा में पूरकता क्रम में स्वयं में आवर्तनशीलता को प्रमाणित करता है। जिसमें से पहली विधा नैसर्गिकता और धरती के साथ प्राकृतिक नियमों को जानना-मानना-पहचानना-निर्वाह करना परमावश्यक तत्व है। प्राकृतिक नियम अपने आप में पदार्थ-प्राण-जीव-ज्ञानावस्था एक दूसरे के लिए पूरक होने के स्वरूप में देखने को मिलता है।
पदार्थावस्था, प्राणावस्था के लिए पूरक होना सर्वविदित तथ्य है। धरती पर ही सभी अन्न-वनस्पति-वन सम्पदा का होना देखा है।
यही प्राणावस्था की वस्तुएं हैं और ये सभी निष्प्राणित होने के उपरांत इसी धरती में समाता हुआ हर मानव देखता है। इसके साथ-साथ और तथ्य भी जुड़े हुए होते हैं। यह धरती अपने-आप में अथक प्रयास और प्रक्रिया सहित ऋतु संतुलन व्यवस्था को प्राप्त किया। तभी इस धरती पर वर्षा, ठंडी, गर्मी की निश्चित दिनों का, मासों का गणना मानव में प्रचलित रूप में ज्ञातव्य है (समझ में आता है)। ऋतु संतुलन की महिमा ही है इस धरती में सम्पूर्ण अन्न, वनस्पतियाँ स्वयं स्फूर्त विधि से अलंकृत, सुशोभित हुआ करते हैं। जैसे शिशिर ऋतु में पत्ते पक जाना, वसंत ऋतु में पल्लवित होना, कुसुमित होना, वर्षा ऋतु में अपने में परिपुष्ट होना देखा जाता है। इस विधि से वन सम्पदाएँ समृद्ध होता हुआ देखने को मिलता है। अ.श. (115-116)