अस्तित्व कैसा है? कितना है? क्या है?
अस्तित्व में अनन्त ग्रह-गोल व्यापक वस्तु में समायी हुई है - जिनका दृष्टा केवल मानव ही है। भले ही कैसे हैं, कितने है, क्या है ? इन तथ्यों का स्पष्टीकरण न हो। इसी प्रकार धरती में चारों अवस्थाओं के यथा पदार्थ, प्राण, जीव व ज्ञानावस्था सहज वस्तुओं का दृष्टा भी मानव ही है। प्रकारान्तर से इन सभी चीजों को हर मानव देखता ही है। साथ-साथ हर कार्यशील वस्तुओं को व्यापक में समायी हुई देखना समझना समीचीन है। जितने भी अचल वस्तुएँ हैं वे सब धरती के साथ ही गतिशील रहना देखने को मिलता है। धरती स्वयं व्यापक में समायी हुई होना कल्पना में आता है, अध्ययन से स्पष्ट होता है।
कल्पनाएँ जीवन सहज कार्य महिमा है। कल्पना में सम्पूर्ण अस्तित्व समाने की क्रिया स्पष्ट हुई। कल्पना का तात्पर्य अस्पष्ट आशा, विचार, इच्छा का ही गतिशीलता है। इस प्रकार मानव की कल्पना से स्पष्टीकरण की ओर ही जागृति चिन्हित हो पाता है।
अस्तित्व कैसा है इस तथ्य को (समाधानात्मक भौतिकवाद पुस्तक में) ‘अस्तित्व एवं अस्तित्व में परमाणु का विकास’ में स्पष्ट किया जा चुका है। कितना है का उत्तर हर मानव के जागृति सहज विधि से उदय होता ही रहता है। सम्पूर्ण अस्तित्व मानव की आवश्यकता के अर्थ में समाहित नहीं होता। दूसरी भाषा में सम्पूर्ण अस्तित्व मानव सहज भाषा की सीमा में समाता नहीं है। इससे यह भी पता लगता है सम्पूर्ण अस्तित्व मानव की आवश्यकता से अधिक है ही। अस्तित्व में ही व्यापक और अनन्त इकाईयाँ अविभाज्य रूप में होना दिखाई पड़ता है समझ में आता है।
इसे देख पाना मानव जागृति क्रम सहज समीचीनता है। इस प्रकार कितना है का स्पष्टीकरण समझ में आता है।
क्यों है का उत्तर इस प्रकार स्पष्ट है कि सम्पूर्ण घटना स्वरूप ही सह-अस्तित्व में होना स्पष्ट होती है। व्यापक वस्तु में ही अनन्त वस्तुओं की अविभाज्यता अनुस्यूत है। ऐसे सदा-सदा वर्तमान रूपी अस्तित्व क्यों वाला प्रश्न को भी मानव ही प्रस्तुत करता है। मानव भी अस्तित्व में अविभाज्य इकाई है। वर्तमान में जो कुछ भी देखने-समझने को मिल रहा है इसको वर्तमान में प्रकाशित करना ही अस्तित्व सहज सार्थकता स्पष्ट होती है। अस्तित्व में जो कुछ भी है इसकी निरंतरता ही इसका प्रयोजन है। इस प्रकार तीनो प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट हो जाता है। अ.व. (148-149)
यह निश्चित बात है कि निश्चयता में ही मानव जीना चाहता है। अनिश्चयता मानव को स्वीकृत नहीं है। भ्रम की स्थिति में भी निश्चयता की अपेक्षा मानव में निहित रहती ही है। निश्चयपूर्वक ही मानव धरती पर चल पाता है। हवा पर चलता है और पानी पर चलता है (यान वाहन द्वारा)। इसी प्रकार अन्य गतियों मे भी निश्चयता की अपेक्षा बनी हुई है। धरती पर चलने के पहले से ही धरती की स्थिरता धरती पर निहित मानव को ज्ञात रहती है। इस प्रकार,निश्चय के आधार पर निश्चित्ता के अपेक्षा में स्थिरता के अपेक्षा में ही मानव जीता है।