अध्याय ३ - प्रस्तावना

“सार्वभौम न्याय,धर्म, सत्य का प्रस्ताव”

बीसवीं शताब्दी के दसवें दशक में भारत में सर्वेक्षण विधि से निरीक्षण करने पर पता चला है कि सौ व्यक्तियों को हम पूछते है कि सर्वशुभ होना चाहिये कि नहीं ? और आगे विचार और कार्यक्रम होना चाहिये कि नहीं ? ऐसा पूछने पर 90 से अधिक लोग तुरंत स्वीकारते है सर्वशुभ होना चाहिये। विचार और कार्यक्रम होना चाहिये या नहीं - इस मुद्दे पर प्रतिशत निकालने पर पता चला 80 प्रतिशत होना चाहिये, इस बात को स्वीकारते हैं।

जब दूसरे प्रश्न को दो भागो में बाँटते है - कार्यक्रम होना चाहिये कि नहीं, तब इस स्थिति में 60 प्रतिशत लोग सहमत हो पाते हैं। बाकी लोगो में आगे बिना पूछे ही अधिकांश लोग अपने में से बताते है कि ये हो ही नहीं सकता है कर ही नहीं सकते हैं।

ऐसे ही किसी किसी से सुनने को मिलता है वह भी विशेष कर अध्यात्मवादी खेमे में जीते हुए लोग कहते हैं “कई अवतार हो गये कई महापुरूष हुए, सिद्ध हुए, तपस्वी हुए, चमत्कारी हुए, यति-सति हुए, ईश्वर दूत और ज्ञानी हुए ऐसे अनगिनत लोग होते हुए अभी तक सर्वशुभ घटित हुआ नहीं है।” भौतिकवादी खेमे के माहिरो से पूछने पर यही कहते है ये सब सोचने की कहाँ जरूरत है। मोटी तनख्वाह वाला नौकरी, चमकता हुआ गाड़ी, सर्व सुविधा पूर्ण महल और जो इच्छा हुआ वो सब भोगने को ही सुख का स्रोत बताते हैं।

सबको आप जैसी सुविधा नहीं मिलने पर छीना झपटी करेंगे, ये पूछने पर वे कहते है संघर्ष तो करना ही पड़ेगा। उसे नाम देते है “लाइफ इज स्ट्रगल” (जीवन एक संघर्ष है)।

साथ में यह भी बताया करते है कि बेटर लाइफ के लिये स्ट्रगल आवश्यक है। संघर्ष और उससे बनने वाले परेशानियो की ओर ध्यान दिलाने पर बताते है कि प्रकृति में ही अतंर्द्वन्द है इसलिए संघर्ष करना स्वाभाविक है। संघर्ष की अन्तिम मंजिल भी यही बताते हैं जो ज्यादा मजबूत होता है वही अस्तित्व को बनाए रखने में समर्थ होता है। ये सब अधिकांश मेंधावियो को विदित है ही।

शुभेच्छा से विज्ञान को जो अध्ययन किये हुए लोग और विज्ञान पढ़ा हुआ युवा पीढ़ी विज्ञान की गति किसी काला दीवाल के सामने पहुंचना देख चुके है।

ऐसे लोग तत्काल सर्वशुभ के लिये सहमत होते हैं, हुए हैं और सर्वशुभ साकार होने के लिए आवश्यकीय कार्य, व्यवहार, विचार, अनुभव अनुभव प्रमाणो के साथ जीने में तत्पर हो चुके हैं। इस मुद्दे को इसलिए यहाँ स्पष्ट किया गया कि रहस्यमयी ईश्वरवादी और भौतिकवादी (संघर्ष केन्द्रित) विधियों से मानव का अध्ययन मानव के लिये सन्तुष्टिदायक नहीं हो पाता है। क.द. (48-50)

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