समाधान और द्वन्द्व
जब से मानव सुनने-सुनाने योग्य हुआ, तब से भय और प्रलोभन वश ईश्वरवादिता क्रम में से ईश्वर को श्रेष्ठ तथा जीव-जगत का कर्त्ता, भरता, हरता मानता ही आया। कुछ समय बाद भौतिकता का नाम आया, तब से भौतिकतावादी, भौतिकता को अपने में द्वन्द्व ही बताते आये हैं। द्वन्द्व बताने वाले अपने को अत्यधिक वैज्ञानिक मान लिए हैं। विज्ञान को विधिवत अध्ययन मानते है।
विधिवत अध्ययन का सार तर्क संगत होने से है। इस विधि से अथवा उपक्रमों से मानव ने भौतिक संसार में संधर्ष विधि से विकास को माना, जबकि आदर्शवादियों ने जगत् को ईश्वर की कृपा से उत्पन्न मान लिया।
द्वन्द्व कहने के मूल में अंतरविरोध और बाह्य विरोध नामक दो बातों की स्वीकारते हुए, अंतर्विरोध को विकास का आधार बताया गया। बाह्य विरोध को संघर्षपूर्वक स्व-वैभव अथवा स्वयं की ताकत को प्रदर्शित करने का आधार बताया गया। जबकि वास्तविकताओं का परिशीलन करने पर इसके विपरीत तथ्य उभर आए। यह धरती अपने में व्यवस्था है। इसके साक्ष्य में इसी धरती पर “चारों अवस्थाओं” ने सह-अस्तित्व को प्रमाणित किया है। इसी धरती पर पदार्थावस्था (मिट्टी, पत्थर), प्राणावस्था (पेड़, पौधे), जीवावस्था (पशु, पक्षी) और ज्ञानावस्था (मानव) देखने को मिला है।
यह सब देखने वाला अर्थात् समझने वाला ज्ञानावस्था का मानव ही है।
अभी तक मानव परंपरा में समझदारी की स्थिति नही बन पाई है। जबकि मानवेतर प्रकृति अर्थात पदार्थ, प्राण एवं जीवप्रकृति सानुकूलता के साथ “त्व “ सहित व्यवस्था के रूप में है। पदार्थ, प्राण, जीव इन तीनों अवस्थाओं में परस्पर पूरकता सिद्घांत प्रभावशील रहता ही है। जैसे पदार्थावस्था प्राणावस्था के लिए प्राणावस्था पदार्थावस्था के लिए पूरक है- यह स्पष्ट है।
ये दोनों अवस्थाएँ जीवावस्था के लिए पूरक हैं। जीवावस्था भी प्राणावस्था और पदार्थावस्था के लिए पूरक है यह प्रमाणित है।
जैसे- सम्पूर्ण जीव पूरक होने के क्रम में पदार्थावस्था को अपने मल, मूत्र और शरीर के उपयोग से और वनस्पतियों में होने वाले अनेक संक्रामक और आक्रामक रोगों को अपने मल मूत्र श्वास एवं शरीर गंध से दूर करने में सहायक हुए हैं। जीवों का मल मूत्र और श्वसन क्रिया महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हुआ देखने को मिलता है। इस प्रकार इन तीनों अवस्थाओं का परस्पर पूरक होना, देखने को बन पाता है।
मानव “ज्ञानावस्था” की इकाई होते हुए इस बीसवीं शताब्दी के दसवीं दशक तक मानवेत्तर प्रकृति के साथ पूरक होने के स्थान पर इन्हें सर्वाधिक क्षतिग्रस्त करने में लगा ही रहता है।