इसका साक्ष्य है इस धरती के ऊपरी भाग में बनी हुई रक्षा कवच(ओज़ोन लेयर)। अर्थात् इस धरती की ओर आने वाली सूर्य ताप को यह धरती स्वयं पचाने योग्य परावर्तन विधि और प्रणालीबद्ध करता रहा है। वह धरती के सभी ओर से विलय होता हुआ आधुनिक उपकरणों से भी देखा गया है। जिसको विज्ञान की भाषा में ओजोन का नाम बताया करते हैं।

यह भी वैज्ञानिक मापदण्डों से पता लग चुका है कि यह धरती का ताप किसी न किसी अंश में बढ़ना शुरू कर दिया है। इसका गवाही के रूप में समुद्र का जल किसी मात्रा में बढ़ता हुआ पहचाना गया है। इसी के साथ यह भी पहचाना गया है कि धरती में ताप बढ़ने पर ध्रुव प्रदेशों में जमा हुआ बर्फ पिघल सकता है। यदि पिघल जाए तब धरती अपने में जितना विशाल क्षेत्र को पानी से रिक्त बनाए रखा है, उनमें से सर्वधिक भाग जल मग्न होने की संभावना पर ध्यानाकर्षण कराया जा चुका है।

यहाँ उल्लेखनीय घटना यही है। विज्ञानी ही खनिज तेल और कोयला को निकालने के लिए यांत्रिक प्रोत्साहन किए और उसी से प्रदूषण सर्वाधिक रूप में होना स्वीकारे। इसके पश्चात भी उन खनिज तेल और कोयले की ओर से अपना ध्यान नहीं हटा पा रहे हैं। यहाँ पर प्रदूषण और ताप संबंधी दो तलवार मानव जाति पर लटकी ही हुई है।

इसका निराकरण हेतु निम्न विकल्पों को तत्काल अपनाना ही होगा:-

  • सौर ऊर्जा
  • प्रताप ऊर्जा( जल विद्युत) – जल प्रवाह बल
  • दृष्ट तरंग – पवन ऊर्जा
  • गोबर गैस, कचड़ा गैस, तेलीय वनस्पतियाँ । अ.श. (63-65)

संकरीकरण और कृत्रिमता से समस्या

इस शताब्दी में, सकंरीकरण प्रक्रिया (हायब्रिड, जनेटिक माडिफिकेशन) पर प्रयोग किया, जिसमें फल, फूल, पशु शामिल है। इससे यही देखा गया कि आकर में तो मोटाई आ गया, परंतु उस वस्तु में निहित गुणवत्ता कम हो गई बीज परंपरा खत्म हो गई, और यह नए प्रजाति रोग ग्रस्त हो गए। इस पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। इसी के चलते कृत्रिम खाद (रासायनिक खाद) मानव के लिए और धरती के लिए घातक सिद्ध है, यह स्पष्ट हो गया है।

जितना मानव कृत्रिम होता गया उतना ही प्रकृति के साथ अपराध करते गया अथवा झुकता, छुपता गया या भयभीत होते गया।

उसी प्रकार मानव के साथ द्रोह-विद्रोहात्मक षंडयत्र रचता आया, फलस्वरुप मानव का दुखी होना पाया गया। ऐसा दुख शीरीरिक, मानसिक विचित्र रोगों के रूप में अथवा विसंगतियों के रूप में देखने को मिला। इससे मानव सहज ही

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