अध्याय 3 : मानव-मानव संबंध में व्यवस्था
3.1 संबंध एवं आचरण – आधार
3.1.1 संबंध परिचय – दायित्व, कर्तव्य और व्यवहार
मानव परम्परा के अतिरिक्त और सभी अवस्था के यथा जीवावस्था, प्राणावस्था, पदार्थावस्था में प्रत्येक एक-एक समुदाय अपने-अपने जाति के अनुसार आचरण करता हुआ देखने को मिलता है यही “त्व” सहित अवस्था, समग्र व्यवस्था में भागीदारी का सूत्र है (जैसे गायत्व, नीमत्व, लोहत्व)। मानवेत्तर प्रकृति में हर जाति अपने-अपने समुदाय के रूप में मौलिक है क्योंकि व्यवस्था सूत्र से सूत्रित है। मानव को अखंड जाति के रूप में प्रदिपादित संबोधित करने के क्रम में यह शास्त्र है। मानव जब मानवत्व को पहचानता है, स्वीकारता है, निश्चय करता है तभी जागृति के प्रमाण के रूप में स्वंय में व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है। म.वि. (171)
सम्बन्धों को पहचानना ही संस्कार है। ऐसे सम्बन्ध अस्तित्व सम्बन्ध, मानव सम्बन्ध और नैसर्गिक सम्बन्ध के रूप में जानना और पहचानना जागृत मानव में स्वाभाविक क्रिया है। अस्तित्व सम्बन्ध सह-अस्तित्व के रूप में, नैसर्गिक सम्बन्ध जल, वायु, वन, धरती के रूप में, मानव सम्बन्ध अखण्ड समाज - सार्वभौम व्यवस्था के अर्थ में सम्बन्धों को पहचानना एक आवश्यकता है। व्य. श. (284-)
समाज का आधार परिवार है। परिवार के बिना मानव की पहचान होती नहीं है। हर मानव किसी परिवार का अंगभूत होना पाया जाता है। इसके अलावा कोई पहचान भी नहीं होती है। किसी संस्था में भागीदारी भी परिवार संस्था में भागीदारी है तभी व्यक्ति की पहचान हो पाती है। ज.व. (169-)
व्यवहार में सार्थक होने के लिए संवाद में इस तथ्य को पहचाना जा सकता है कि परस्परता में ही “व्यवहार” होता है और प्राकृतिक ऐश्वर्य और मानव की परस्परता में ही “उत्पादन कार्य” सम्पन्न होता है। व्यवहार कार्यकलाप में, उत्पादन कार्यकलाप में अनेकानेक विधाएँ जनसंवाद के लिए विषय बन जाती हैं। सबंध एक मुद्दा है यह सहअस्तित्व में ही प्रमाणित होना पाया जाता है। धरती, हवा, पानी, जंगल, पहाड़ वन, वनस्पति, अन्न, औषधियो के साथ, परस्पर, सहअस्तित्व होना पाया जाता है।
मानव का मानव के परस्परता में व्यवहार होता है। व्यवहार में संबंधो को पहचानना होता ही है। इन संबंधो को पहचानने के रूप में कम से कम विश्वास मूल्य प्रमाणित होना एक स्वाभाविक उपलब्धि है, प्रक्रिया है।
विश्वास होने के आधार पर आरंभ होते हुए प्रयोजनो को, लक्ष्यो को और प्रक्रियाओं को पहचानने के अर्थ मे हर संवाद सार्थक होता है। मानव सम्बंधो में ही कृतज्ञता, गौरव, श्रद्धा, प्रेम, विश्वास, वात्सल्य, ममता, सम्मान, स्नेह सार्थक होते है। ये सब अभ्युदय के अर्थ में ही प्रयोजनशील होना पाया जाता है। अभ्युदय स्वयं में सर्वोतोमुखी समाधान