इन तथ्यों से यह विदित हो जाता है कि जीवन शक्तियों से तंत्रित मेधस तंत्र द्वारा ज्ञानेन्द्रियों का कार्यकलाप सम्पन्न होता हुआ स्पष्टतया देखा गया है। अतएव जीवन ही न्याय, धर्म, सत्य को जानता है, मानता है, पहचानता है, निर्वाह करता है। फलस्वरूप जीवनाकांक्षा रूपी सुख, शांति, संतोष, आनंद भोगता है। भ्रमवश ही शरीर को जीवन मानते हुए प्रिय, हित, लाभात्मक प्रवृत्तियों में ग्रसित होते हुए स्वयं दुखी होता है, अन्य को दुखी बनाता है। नैसर्गिकता को भी अव्यवस्था में परिणित कर देता है। इस प्रकार से मानव अभी तक भ्रमित कार्यों को पूरा करने वाला है या कर चुका है। अब शेष जागृत कार्यों विचारों सहित सार्वभौम व्यवस्था, अखण्ड समाज सूत्रों में सूत्रित होना ही है। यही मानव का सुखद, सुंदर, समाधानपूर्ण कार्य है। अ.व. (261-271)

समाधान = सुख। समाधानित होना ही लक्ष्य है

इस प्रकार सह-अस्तित्व सहज विधि से मानव व्यवस्था को पहचानने का मार्ग प्रशस्त होता हैं। इसका सूत्र यही है। प्रत्येक एक अपने “त्व” सहित व्यवस्था हैं और समग्र व्यवस्था में भागीदार हैं। इसलिए मानव भी मानवत्व सहित व्यवस्था है और उसकी समग्र व्यवस्था में भागीदारी सहज संभव हैं। इसीलिए व्यवस्था, मानवत्व सहज गति है, न कि शासन। व्यवस्था विधि से ही परस्परता में मूल्य और मूल्यांकन सार्थक होता हैं। व्यवस्था अस्तित्व सहज वर्तमान मे विश्वास हैं। अस्तित्व नित्य वर्तमान हैं। वर्तमान में विश्वास रहना, उसकी अक्षुण्णता (निरन्तरता) की आवश्यकता रहना, यही मानव में जागृति का प्रमाण हैं।

व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी ही गति है।

प्रत्येक मानव वर्तमान में विश्वस्त, भविष्य के प्रति आश्वस्त रहना ही चाहता हैं। इसमें अगर कोई बाधा निर्मित हुई है तो वह मानव के कारण ही हैं। यदि रहस्यता हुई है तो वह भी मानव सहज नैसर्गिकता है। सर्वप्रथम मानव के साथ विश्वास बनाए रखने; विश्वास पाने और उसकी निरंतरता पर भरोसा कर सकें, यही मुख्य स्थली हैं। इस पर विचार करने, विवेचना करने, योजनाबद्घ तरीके से प्रमाणित होने के लिए मानव ही अध्ययन के मूल में प्रस्तुत होता हैं। अध्ययन की मूल वस्तु मानव ही हैं। अध्ययन करने वाला मानव ही हैं और प्रयोजित होते समय मानव और नैसर्गिकता का मूल्यांकन होना एक आवश्यकता बन जाती है।

मानव जब कभी भी अपने में समाधान से तृप्त होता हैं, तब-तब नैसर्गिकता में समाधान यथा मानव धरती, जल, वायु, जगंल, जीव, पक्षी के साथ समाधान आता हैं। इनके साथ कितना समाधान सहज कार्य किया, यही स्व-समाधान की पुष्टि है।

सह-अस्तित्ववादी नजरिए से जब हम देखते हैं, तब हमें आंकलित होता है कि हम कितना समाधानित हैं। इस बात को अपने में मूल्यांकन करने योग्य होते हैं। जागृति पूर्वक ही मानव का वर्तमान में विश्वास और उसकी अक्षुण्णता के प्रति आश्वस्त होना पाया जाता है। अन्यथा भ्रमवश आवश्यकता से सुविधा, सुविधा से भोग, भोग से अतिभोगवादी प्रलोभनों के चक्कर में संग्रह, सुविधा लिप्सावादी आधार पर तमाम अपराध कर डालता हैं। अभी तक का किया हुआ

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