अव्यवस्था मानव जाति की पीड़ा का ही स्वरूप है, क्योंकि और व्यवस्था की समझ बराबर पीड़ा है। मानव जब कभी भी पीड़ित होता है, उसका अध्ययन करने पर पता लगता है कि अव्यवस्था की समझवश ही यह पीड़ित हुआ रहता है। व्यवस्था की अपेक्षा में ही व्यवस्था की समझ और पीड़ा प्रक्रिया बद्ध रहता है। इसका व्यवहारिक रूप-एक आदमी को ज्वर आने की स्थिति अव्यवस्था है, हाथ पैर टूटने की स्थिति अव्यवस्था है। वाद विवाद होने की स्थिति अव्यवस्था है फलस्वरुप पीड़ा है।

वाद विवाद मानव में तभी प्रभावशील होता है जब दोनों पक्ष गलत हो अथवा एक पक्ष अवश्य गलत हो। इस स्थिति में वाद विवाद हो पाता है। दोनों पक्ष यदि सही हो, उस स्थिति में वाद विवाद होने की घटना नहीं हो पाती।

इसके स्थान पर परस्पर विश्वास, समाधान के प्रति एक जुट निष्ठा का होना पाया जाता है। कुछ आयामों में इसके प्रमाण स्थापित हो चुके हैं। इस क्रम में यह भी पता लगता है कि वाद-विवाद के मूल में कम से कम एक पक्ष में गलती रहती ही है। गलती का मूल रूप भ्रम ही है। भ्रम का कार्यरूप अधिमूल्यन, अवमूल्यन और किसी एक वस्तु के स्थान पर दूसरी वस्तु समझना ही (निर्मूलयन) है। इसके उदाहरण स्वरूप सांप और रस्सी को देखा जा सकता है। सांप को रस्सी समझने या रस्सी को सांप समझने से इससे होने वाली परेशानी स्वयं सिद्ध है। लोहा को सोना समझना और सोने को लोहा समझना यह अधिकमूल्यन और अवमूल्यन की परेशानी है। इस प्रकार इन तीनों स्थितियों में मानव गलती करता ही है।

स्वयं परेशान रहता है, फल स्वरुप वातावरण एवं नैसर्गिकता से परेशानी पैदा करता है। क्योंकि इसके पास जो होता है उसको बंटन करता है।

इस प्रकार देखने पर यह भी तथ्य समझ में आता है कि मानव को दो ही स्थिति में देखा जा सकता है-वह है भ्रम और निर्भ्रम (जागृत) स्थिति। भ्रम मानव को अव्यवस्था के रूप में प्रकाशित हो पाता है। विकल्प के स्वरूप में अर्थात अव्यवस्था के विकल्प में, व्यवस्था ही है। अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन व्यवस्था-सार्वभौम व्यवस्था, अस्तित्व सहज व्यवस्था, सह अस्तित्व सहज व्यवस्था, रासायनिक भौतिक रचना सहज व्यवस्था, विकास सहज व्यवस्था जीवन सहज व्यवस्था और जीवन जागृत सहज व्यवस्था को स्पष्ट करता है। इसको अध्ययनगम्य करना ही सह-अस्तित्ववाद का उदेश्य है।

“सह- अस्तित्ववाद” में “समाधानात्मक भौतिकवाद” एक प्रबंध है। “व्यवहरात्मक जनवाद” दूसरा है, “अनुभवात्मक अध्यात्मवाद” तीसरा है।

कुल मिलाकर व्यवस्था सूत्रों का सम्मिलित नाम है - समाधान। इसी नाम का वैभव रूप मानव में भी प्रमाणित होता है। प्रत्येक मानव को समझदारी के साथ जीने का हक बनता है। परंतु साथ- साथ व्यवस्था को समझने की जिम्मेदारी भी है। समझदारी का स्त्रोत परंपरा ही है। इस क्रम में प्रचलित लाभोन्मादी, भोगोन्मादी, कामोन्मादी (लाभ, भोग, नाम का पागलपन) अध्ययन प्रबंधों और उपक्रमों के स्थान पर विकल्प के रूप में “कामोन्मादी मनोविज्ञान” का

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