भी इसी तरीके से हुआ है। अभी तक मानव में भय और प्रलोभन यथावत् हैं। भय और प्रलोभन का यही क्रम बनता रहा है कि आवश्यकता से सुविधा, सुविधा से भोग, भोग से अतिभोग। इसी क्रम में जीने के तरीकों को अपनाया गया।
इसका स्रोत संग्रह को मान लिया गया। संग्रह के लिए एक मात्र स्रोत, यह धरती रही आई। फलस्वरुप जो मनमानी कर सकते थे, उससे नैसर्गिकता का असंतुलन, प्रदूषण के रूप में एवं विकराल जन संख्या के रूप में सामने आया। भ.व. (342-346)
विकल्प के रूप में सहअस्तित्व रूपी दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान, (सहअस्तित्व वाद में जीवन ज्ञान) और मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान के आधार पर ही समझदारी, अर्थात समाधान और उसकी निरंतरता का होना पाया गया है। समझा गया है और जिया गया है। ज. व. (97-108)
मानव जागृति ही स्वीकारता है, भ्रम को नही
सह-अस्तित्व में अनुभव सहज समझदारी = समाधान। समाधान सहित ही समृद्घि का अनुभव होता हैं। समाधान मूलत: सह-अस्तित्व सहज समझदारी हैं। सह-अस्तित्व सहज वैभव है। अस्तित्व ही परम सत्य है। अस्तित्व सहज स्वरुप सत्ता में संपृक्त प्रकृति है। इस प्रकार अस्तित्व सहज समझदारी स्वयं समाधान है, यह त्रिकालाबाध (तीनों काल – भूत, भविष्य, वर्तमान) सत्य है। मानव ही समझदारी के साथ जीता है या जीना चाहता हैं या जीने के लिए बाध्य है क्योंकि समझदारी के बिना मानव का स्वयं को व्यक्त करना संभव नहीं है। हर मानव स्वयं को व्यक्त करना चाहता ही है। समस्या की पीड़ा से मानव पीड़ित होता हैं। इस ढंग से मानव समस्या को वरता नहीं हैं या वरना नहीं चाहता है।
इन आधारों पर समाधान ही मानव का शरण, वैभव व अपेक्षा है। समाधान अस्तित्व सहज हैं। अस्तित्व जैसा है, वैसे ही समझने की स्थिति में समाधान ही मानव को करतल गत होता हैं। भ. व. (346)
जागृति पूर्वक ही मानव मानवीय व्यवस्था को अपनाया करता है अन्यथा भ्रमित रहता है। भ्रमित रहने तक स्वयं अव्यवस्थित रहता है अन्य से व्यवस्था की अपेक्षा करता है। स्वयं समस्या को प्रसवित कर देता है अन्य से समाधान चाहता है यही भ्रम कहलाता है। भ्रमवश मानव परेशान होता है परेशानियों से मुक्त होने की अपेक्षा हर समस्याग्रस्त मानव में निहित है। इन्हीं आधारों पर जागृति अवश्यंभावी हो गई है। शुभ संकेत यही है मानव को जागृति स्वीकार होती है भ्रम स्वीकार नहीं होता है। जागृति के अनन्तर ही हम मानव सदा-सदा समाधान परम्परा के रूप में प्रमाणित हो पाते है। ऐसी शुभ घटना के लिए सूचना के रूप में मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्व वाद मानव कुल के लिए प्रस्तुत है। ज. व.(227 – 233)