आवश्यकतानुसार अनुसंधान न करते हुए और इसके विपरीत दासता अर्थात् ईश्वर के प्रति दासता और सामुदायिक-धर्म और सामुदायिक राज्य के प्रति दासता को स्वीकार करने के लिये परंपरागत विधि से कार्यक्रमों को प्रस्तुत करना अथ से इति तक भ्रम है।

जागृति सहज प्रमाण यही है हर व्यक्ति में पाये जाने वाले कल्पनाशीलता के तृप्ति बिन्दु रूपी परिवार मूलक व्यवस्था में पारंगत बनना और बनाने के लिए सहमत होना और कर्म स्वतंत्रता का तृप्ति बिंदु रूपी स्वानुशासन सहज स्वतंत्रता प्रमाणों के रूप में प्रमाणित होता है। इसे करना, कराना ही एकमात्र उपाय है। यह इस दशक से समीचीन हो गया है। हर मानव चारों अवस्थाओं को उन-उनके स्वभाव गति प्रतिष्ठा को जानने-मानने और पहचानने-निर्वाह करने योग्य हैं। साथ ही रासायनिक-भौतिक रचना-विरचना को स्वीकारने और जीवन के अमरत्व को समझने, स्वीकारने योग्य और सत्य बोधपूर्ण होने योग्य और अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित करने-कराने योग्य हैं।

इन्हें अनदेखी करते हुए शरीर को ही जीवन समझते हुए, समझदार होने का दावा करते हुए इस पर लिये गये निर्णयों के अनुसार स्थापित किये गये परंपरा अथ से इति तक भ्रम है।

इतना ही नहीं शरीर को ही जीवन समझाने के क्रम में ही मानव को जीव-जानवर सम्बोधित किया यह अत्यंत भ्रम, गलती है। जबकि जीवन और शरीर के सह-अस्तित्व में ही मानव परंपरा वैभवित है। मानव प्रकृति की प्रत्येक इकाई में अविभाज्य रूप, गुण, स्वभाव, धर्म रूपी मात्रा को जानने - मानने - पहचानने - निर्वाह करने योग्य इकाई है। यह जागृतिपूर्वक हर व्यक्ति में, से, के लिये समान है। इसके लिये मानव परंपरा जागृत रहना अनिवार्य है। परंपरा इससे वंचित, विमुख, अनदेखी करते हुए विखण्डन के आधार पर अथवा गति रत वस्तु का ध्रुव बिंदु न पहचानने के आधार पर मूलत: वस्तु अस्थिर, अनिश्चित मान लेना और मना लेना आमूलत: भ्रम है और गलती है जबकि अस्तित्व स्थिर, अस्तित्व में विकास और जागृति निश्चित है।

इन्द्रिय सन्निकर्ष में ही ‘अनुभव होता है’ ऐसा मानना और मनवाना, इसको लोकव्यापीकरण करने का सभी उपाय तैयार करना, साथ ही लाभोन्माद, कामोन्माद और भोगोन्मादी मानसिकता को कार्यशील, प्रगतिशील, विकासशील और अत्याधुनिक मानना और मनाना अथ से इति तक भ्रम है।

जबकि जीवन्त शरीर में ही इन्द्रिय सन्निकर्ष होना देखा गया है। जीवन ही शरीर को जीवन्त बनाए रखता है। सत्य भासने के लिये शरीर और जीवन का सह-अस्तित्व आवश्यक है। इसी क्रम में जीवन, जागृति और जागृति पूर्णता को प्रमाणित करता है। जागृति को प्रमाणित करने की इच्छा प्रत्येक मानव में समाहित रहता ही है। इसे सार्थक और लोकव्यापीकरण करने के लिये परंपरा का जागृत होना अनिवार्य है। मानव धर्म अर्थात् सर्वतोमुखी समाधान पर आधारित व्यवस्था में जीने देकर जीना है। इसकी सार्वभौमता सर्व स्वीकृत है।

समुदाय परंपराओं में धर्म के नाम पर अनेक मान्यताओं को द्वेष सहित समुदाय के जनमानस को मनाना और स्वयं माने रहना, ऐसे मानने के लिये सम्मति देना, ये सब मूलत: अथ से इति तक भ्रम और गलतियाँ है। अ.व. (108-115 )

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