अब और कितना ताप बढ़ेगा उसकी प्रतीक्षा करने में विज्ञानी लगे हैं। इसके साथ एक और विपदा हुआ प्रदूषण का छा जाना।
इंधन अवशेष से प्रदूषण हुआ। इन दोनों विपदाओं से धरती पर मानव रहेगा या नहीं इस पर प्रश्नचिन्ह लग गया। धरती को मानव ने अपने न रहने योग्य बना दिया। मानव को धरती पर रहने योग्य बनाने के लिए अनुसंधान प्रस्ताव रूप में है। “न्याय पूर्वक जीने” की प्रवृति मानव में कैसे स्थापित हो इसको मैंने अनुसंधान किया है। न्यायपूर्वक जीने में मैं स्वयं प्रवृत्त हूँ।
न्याय किसके साथ होना है? मानव के साथ होना है और मानवेतर प्रकृति के साथ होना है। इसके बाद में हम थोड़ा यहाँ बातचीत करेंगे।
मैं स्वयं एक वेद मूर्ति परिवार से हूँ। मेरे शरीर का आयु इस समय 90 वर्ष है। इन 90 वर्ष में से पहले 30 वर्ष मैंने अपने घर परिवार की परंपरा के अनुसार ही काम किया। 30 वर्ष के बाद के 60 वर्ष मैंने इस अनुसंधान को करने और उससे प्राप्त फल को मानव जाति को अर्पित करने में लगाया हूँ। यह अनुसंधान कैसे किया? यह बात आती है। हमारे शस्त्रों में लिखा है अज्ञात को ज्ञात करने के लिए समाधि एक मात्र स्थान है। उस पर विश्वास करते हुए, अमरकंटक को अनुकूल स्थान मानते हुए, मैं 1950 में अमरकंटक पहुंचा।
अमरकंटक में मैंने साधना किया और साधना को देखा। समाधि को देखने पर पता चला, समाधि में कोई ज्ञान नहीं होता। समाधि में मैंने अपनी आशा, विचार, और इच्छा को चुप होते हुए देखा।
एक दो वर्ष तक मैंने समाधि की स्थिति को देखा पर समाधि में ज्ञान नहीं हुआ। उसके बाद समाधि का मूल्यांकन करने के क्रम में मैंने संयम किया, जिससे प्रकृति की हर वस्तु मेरे अध्ययन में आयी। अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व रूप में है यह बात मुझको बोध हुआ, ज्ञान हुआ, उसको जी करके प्रमाणित करने की अहर्ता आयी। ऐसे ज्ञान को जी कर के प्रमाणित करने में परस्परता में विश्वास होता है।
जीने में ही विश्वास होता है, बस कहने मात्र से विश्वास नहीं होता ऐसा मैंने स्वीकार किया।
इस प्रकार जीते हुए लोगों तक इस बात को कैसे पहुंचाया जाए? इस पर सोचने पर शिक्षा विधि द्वारा इसे प्रवाहित करने का उद्देश्य से वांड़मय तैयार किया। अनुसंधान पूर्वक क्या उपलब्धि हुई? अनुसंधान की उपलब्धि है “समाधान”। सभी दिशाओं, आयामों, कोणों, परिप्रेक्षयों के लिए समाधान उपलब्ध हुआ। अनुसंधान पूर्वक मेरा स्वयं का अच्छी तरह समाधान पूर्वक जीना बन गया। समाधान को जब प्रशिक्षित करने लगे तो लोगों को लगने लगा हमको भी चाहिए, हमको भी चाहिए... ऐसा होते होते हम यहां तक पहुंचे हैं।
मेरे अनुसंधान की उपयोगिता समय आने पर मेरी आवाज में भी बल आया।