इससे यह कहना बना “अपराधों से सहमत हो कर हम इस धरती पर ज्यादा दिन रह नहीं पाएंगे।’’ दूसरी बात “समझदारी से समाधान संपन्न हो कर हम इस धरती पर चिरकाल तक रह सकते हैं।” समझदारी के लिए “चेतना विकास मूल्य शिक्षा” अध्ययन के रूप में हमने शिक्षा विधि से प्रस्तुत किया है।
“हर मानव सुधर सकता है” यह इस बात से पहली संभावना है।
हर मानव सुधर कर अपने सुधार को प्रमाणित कर सकता है। यह संभावना में विस्तार को क्या नापा जा सकता है? हर मनुष्य मानव सुधरने पर क्या होगा? जैसे हर गाय अपने वंश के अनुसार गायत्व के साथ व्यवस्था में जीता है... जैसे हर वृक्ष अपने बीज के अनुसार वृक्षत्व के साथ व्यवस्था में रहता है... उससे पूर्व जैसे हर पदार्थ परिणाम के अनुसार अपने त्व सहित व्यवस्था में रहता है... इस प्रकार मानव सुधरने के बाद मानवत्व सहित व्यवस्था में जी सकता है।
इस अनुसंधान पूर्वक “मानव का अध्ययन” संभव हो गया है। यह प्रस्ताव आदर्शवाद और भौतिकवाद दोनों का “विकल्प” है।
आदर्शवाद शुरू भी “रहस्य” से करता है और उसका अंत भी “रहस्य” में ही होता है। दूसरे भौतिकवाद से “सुविधा संग्रह” ही जीने का लक्ष्य बनता है। सुविधा संग्रह का कोई तृप्ति बिंदु होता नहीं है। कितना भी सुविधा पैदा करें और सुविधा पैदा करने की जगह बना ही रहता है। कितना भी संग्रह करें और आगे की संख्या रखा ही रहता है। विकल्प विधि से सोचने पर यह निकलता है “मानव लक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व है।” हमें “सुविधा संग्रह” के पीछे ही लगा रहना है या “समाधान समृद्धि” की ओर चलना है यह हमको निर्णय करना है।
समझदारी का मतलब है सह अस्तित्व स्वरूपी अस्तित्व को समझना और सहअस्तित्व स्वरूप में जीना।
सहअस्तित्व स्वरूप में जीने में हमारी न्यायपूर्वक जीने की बात बनती है। न्यायपूर्वक जीने में किसी का किसी पर “आरोप”, किसी की किसी से “शिकायत”, किसी की किसी पर “आपत्ति” बनाना नहीं है। सहअस्तित्व विधि को छोड़कर यदि हम व्यक्तिवादी / समुदायवादी विधि से जीने के बारे में सोचते हैं, तो समस्याएं तैयार हो जाती हैं।
मानव मानवीयता पूर्वक जीने से व्यक्तिवादिता से मुक्त होता है। चेतना विकास को जब समझते हैं, जीते हैं तो व्यक्तिवाद / समुदायवाद दोनों से मुक्त हो जाते हैं। - (जीवन विद्या राष्ट्रीय सम्मेलन, 1 अक्टूबर 2009, हैदराबाद)