तीनों विधाओं में विशेष और सामान्य का प्रभेद बना ही है। (विशेष और सामान्य का तात्पर्य विद्वान-मूर्ख, ज्ञानी-अज्ञानी, बली-दुर्बली, धनी-निर्धनी के रूप में मान्यता है) यह विशेषकर समुदायगत अन्तर्विरोध के रूप में देखने को मिलता है।
जनचर्चा में यह भी सुनने को आता है कि शिक्षा-संस्कार आदि चारों परम्परा (शिक्षा संस्कार, राज्य, धर्म, व्यापार व्यवस्था) ठीक है और इस बात को स्वीकारा जाता है।
परम्परा सहज विधि से हर मानव संतान किसी न किसी परिवार में समर्पित रहता ही है। जिसके फलस्वरुप परिवार के रूढ़िगत, स्वीकृत खान-पान, बोली, भाषा, रहन-सहन और व्यवहार मर्यादाओं को यथा संभव हर शिशु ग्रहण करता ही रहता है। इसके कुछ दिनों बाद किसी शिक्षण संस्था में भाई-बहनों, मित्रों-गुरूजनों के बीच जो कुछ भी सीखने को, सुनने को, समझने को, पढ़ने को मिलता है इन सबको हर बालक अथवा हर विद्यार्थी अपनी ग्रहणशीलता सहज विधि से ग्रहण करते हैं।
युवा अवस्था को पार करते-करते किसी न किसी धर्मगद्दी, धर्मप्रणाली, धार्मिक रूढ़ियों को स्वीकार लेते हैं। इसी के साथ साथ किसी न किसी देश, राष्ट्र, संविधान और भाषा, जाति चेतना सहित अपनी पहचान को सजाने के लिये हर युवा और प्रौढ़ व्यक्ति यत्न प्रयत्न करते ही हैं।
इसके उपरान्त इस अवस्था तक जो कुछ भी स्वीकारा रहता है उसके प्रति अपनी निष्ठा को जोड़ते हैं। जिन-जिन मुद्दों को स्वीकारे नहीं रहते है उसमें उनकी निष्ठाएँ अर्पित नहीं हो पाती है। इसी कारणवश हर समुदाय में पीढ़ी दर पीढ़ी परिवर्तन की दिशा बनती रहती है। यही मानव परम्परा की विशेषता है। भौतिकता प्रधान दृष्टिकोण से, भोगवादी दृष्टि से मानव को भले ही जीव जानवर कहते हों, किंवा कह रहे हैं इसके बावजूद तथ्य यही है कि जानवरों में यथावत पिछली पीढ़ी के सदृश्य ही अगली पीढ़ी के कार्य-कलाप और प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं।
जबकि मानव परंपरा में पीढ़ी से पीढ़ी में भिन्नताएँ व्यक्त होती ही रही हैं तथा विचार, कार्य, व्यवहार, सुविधा, संग्रह, उपभोग, बहुभोग आदि विधाओं में भी परिवर्तन होता ही आ रहा है।
इसकी समीक्षा में पीढ़ी से पीढ़ी अधिकाधिक सुविधा संग्रह में प्रवर्तित होना देखा गया है। कटट्रवादिता अंधविश्वास और अन्य अर्थविहीन रूढ़ियों के प्रति पुनर्विचार करने के लिए प्रवृत्तियाँ अधिकाधिक लोगों में उदय होती हुई देखने को मिलती हैं। इन्ही तथ्यों से पता चलता है, कि मानव जीव जानवरों से भिन्न है।
भिन्नता का मूल स्रोत सर्व मानव में प्रकाशित कल्पनाशीलता-कर्म स्वतंत्रता ही है।
विगत घटनाओं की स्मृतियों श्रुतियों के आधार पर हर व्यक्ति अपनी कल्पनाओं को दौड़ाने में समर्थ है ही, इसी क्रम में मानव हर घटना के साथ उचित अनुचित को समझने, औचित्यता के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाने, अनुचित के साथ नकारात्मक रवैया अपनाने के लिए अपनी कर्म स्वतंत्रता का प्रयोग करता ही है। यह सर्व मानव में सर्वविदित तथ्य है। इस धरती पर आदिकालीन मानव का भिन्न जलवायु में शरीर यात्रा आरंभ होना, सुस्पष्ट हो चुका है। विभिन्न