इतना ही नहीं, मानव मानव के साथ विद्रोहात्मक-द्रोहात्मक, शोषणात्मक और युद्धात्मक विधियों को अपनाता हुआ स्वयं क्षतिग्रस्त होते हुए अनेकों को क्षतिग्रस्त करने - कराने में लगा रहता है। यह सुदूर विगत से आई समस्याओं का निचोड़ है। इन समस्याओं का समाधान भौतिक-रासायनिक वस्तुओं तथा जीवन व्यापक और अनंत इकाई रुपी वस्तुओं के अविभाज्य अध्ययन से संभव है। इससे समाधानात्मक अवधारणाएँ मानव सुलभ होती हैं।
ऊपर की बातों में मानव के अतिरिक्त तीनों अवस्थाओं के अध्ययन की झलक आई है।
उसके अनुसार और वर्तमान में यही देखने को मिलता है कि “अस्तित्व में प्रत्येक एक अपने त्व सहित व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है।”(त्व – जैसे पाषाणत्व, नीमत्व, बगत्व...) इसके प्रमाणों को पूरक विधि से पदार्थावस्था, प्राणावस्था जीवावस्था में वर्तमान होना स्पष्ट किया गया। इसी क्रम में मानव में, से, के लिए भी व्यवस्था अपेक्षित है।
“अस्तित्व में व्यवस्था ही समाधान है, अव्यवस्था ही समस्या है” मानव अभी तक समस्याओं से जूझते ही आया है।
यथार्थ यही है कि मानव मानवत्व सहित व्यवस्था है और समाधान है। मानव सहज रूप में ही अपनी कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता सहज महिमा के आधार पर अनेक प्रयोग करता है अथवा करने योग्य है ही। कल्पना करने पर पता चलता है कि हर व्यक्ति अपने में समाधान चाहता है। इसी प्रकार न्याय चाहिए या अन्याय, शांति चाहिए या अशांति, संघर्ष चाहिए या समाधान-इन सब कल्पनाओं में मानव सहज ही शांति, न्याय, समाधान जैसे तथ्यों को स्वीकारता है।
मानव स्वाभाविक रूप में ही सुख चाहता हैं भले ही सुख को वह नहीं जानता, इसके बावजूद वह सुख का पक्षधर होता है।
अधिकांश मानव सुख के लिए ही रुचियों, प्रलोभनों के पीछे दौड़ते रहते हैं। इस तथ्य के निरीक्षण परीक्षण के उपरान्त यह निष्कर्ष निकलता है कि परम्परा जिन दिशा कोणों में प्रोत्साहित करता है अथवा जितना जागृत हुआ रहता हैं उसी के अनुरुप दिशा निर्देशन कर पाता है। उक्त समस्या के कारण तत्वों का निरीक्षण परीक्षण किया गया। इसका उत्तर यही मिला कि मानव ने मूलत: मानव को पहचानने में सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य को समझने में ही भूल किया है।
कोई भी मानव सुख चाहता है न कि दुख, समाधान के पक्षधर है न कि समस्या का; व्यवस्था चाहता है न कि अव्यवस्थ। यह धरती तापग्रस्थ हो चुकी है, प्रदूषण छा गया है, मानव का इस धरती पर रहने का प्रश्न चिन्ह लग चुका है।
वर्तमान मानव समाज में भय , प्रलोभन, आस्था
मानव का सर्वेक्षण करने पर पता चलता है कि :-
- मानव भय, प्रलोभन एवं संघर्ष से मुक्ति चाहता है तथा आस्था से विश्वास का प्रमाणीकरण चाहता है।
मानव लाभोन्माद, भोगोन्माद से मुक्ति एवं विकल्प का स्पष्टता चाहता है।