प्राणावस्था एवं जीवावस्था में देखने पर पता चलता हैं कि लोहा जब तक रहता है तब तक उसके त्व में अर्थात् “लोहत्व” में वैपरीत्यता नहीं होती। उसी भाँति आम, बाघ, भालू, गाय आदि में भी वैविध्यता नहीं होती। (लोहा, नीम, चांदी, इन सभी का आचरण है, देश काल में निश्चित है)
जबकि मानव को देखें तो पता चलता है कि इसके विपरीत अर्थात् मानवत्व के विपरीत स्थिति में अधिकतम व्यक्ति प्रकाशित है।
एक ही मानब अलग अलग समय पर विभिन्न आचरण प्रकाशित करता हुआ दिखता है। तात्पर्य यह कि मानव ही इस धरती पर ऐसी एक इकाई है जो मानवत्व के विपरीत कार्य, व्यवहार-विन्यास करते हुए भी अपने को श्रेष्ठ और विकसित होने का दावा करता है। जैसे अधिकतम शोषण एवं युद्ध में समर्थ व्यक्ति, परिवार, समाज अथवा राष्ट्र को विकसित समझा जा रहा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मानव अपने त्व (निश्चित आचरण) को वंशानुषंगीयता में खोजने के अरण्य में भटक गया है या मिटने की तैयारी में आ गया है।
मानव का वर्चस्व वंशानुषंगीयता में उज्जवल एवं अनुकरण होने की व्यवस्था होती तब क्या होता ? या तो वंशानुषंगीयता के समर्थक कहलाने वालों के अनुसार मानव के पूर्वज जैसे बन्दर थे वे मानव क्यों बन गये? बदल क्यों गये? या तो बदलना को विकास समझ लें। इसी प्रकार, पूर्व पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी को बिना समझे व सीखे क्यों नहीं आता?
मानव को देखें तो पता चलता हैं कि मानव में वैविध्यता नहीं (मानव में एक ही जाति है, जबकि पेड़-पौधों से जीवों में अनेक जातियाँ है- शरीर के आधार पर) किन्तु इनमें वंशानुषंगीय अस्थिरता चरमावस्था में पहुँच गई। जैसे चोर का बेटा चोर हो ऐसा आवश्यक नहीं। विद्वान की संतान ने विद्वता का अनुकरण नहीं किया, जबकि मूर्ख की संतान विद्वान भी होती है। आश्चर्य की बात है कि मानव फिर भी स्वयं को वंशानुषंगीयता (वंश के अनुसार चलने वाला) का दावेदार, प्रणेता मान रहा है। यह कितनी दयनीय स्थिति है? जिन वंशानुषंगीयता के आधार पर प्रतिवर्ष ही अनेक निबंध, प्रबंध तैयार हो रहा हैं ये कहाँ तक मानवोपयोगी है?
मानव वंशानुषंगिया नहीं बल्कि संस्कारानुषंगिया (संस्कार के अनुसार चलने वाला) इकाई है।
भ्रमित अवस्था में मानव मान्यता, (कल्पना) से चालित है, तथा अजागृतिवश अमानवीय स्वभावों को व्यक्त करता है, जो निम्न प्रकार से हैं:-
- दीनता - अपने दुख को दूसरों से दूर करने का प्रयास
- हीनता - विश्वासघात, अपेक्षा से विपरीत आचरण
- क्रूरता - परधन, परनारी / परपुरुष परपीड़ा