प्राणावस्था में मौलिकता को रचना विधि के आधार पर सारक - मारक स्वभाव को पहचाना जाता है या वनस्पतियाँ सारक - मारक विधि से अपने स्वभाव को व्यक्त करते रहता है। यह भी प्राण कोषाओं के स्वभाव क्रिया का ही प्रकाशन हैं। कुछ प्राण कोषाएँ कुछ तत्वों को पचाती है और कुछ कोषाएँ अन्य तत्वों को पचा लेता है। इस प्रकार मूलत: प्राण कोषाओं में निहित रस तत्व ही सारक-मारक रूप में प्रकाशित होता है। सारकता का तात्पर्य अधिकतर मानव और जीव शरीर के लिए अनुकूल तत्व हैं। मारकता है- मानव शरीर और जीव शरीरों के लिए प्रतिकूलता।
जैसे- जिस रासायनिक द्रव्य को हम जहर कहते हैं, उसे पचाकर रखे हुए वनस्पति होते हैं। उसे जहरीली वनस्पति भी कहते हैं और ऐसी वनस्पतियों को पहचाना भी गया है।
इसी प्रकार खनिज में भी विषों को पहचाना गया है। इसी क्रम में जीवों एवं स्वेदजों में भी विष संचय करने वाले जीवों व स्वेदजों को पहचाना जाता है। जैसे- कुत्ता, साँप, बिच्छू आदि। जबकि ये सब अपने रूप में जीव, स्वेदज, वनस्पति और खनिज कहलाता है। इस प्रकार वे सब मारक वस्तुएँ है। विशेषकर मानव शरीर के लिए अर्थात् शरीर संरक्षण-पोषण के लिए अनुकूल होता हो उसका नाम है सारक, इसके विपरीत (शरीर संरक्षण-पोषण के लिए विपरीत)होता है वे सब मारक है। इसी आधार पर वनस्पतियों में मौलिकता को पहचाना जाता है। वनस्पतियाँ अपने स्वभाव में संपन्न रहती है।
जीवावस्था में स्वभावों को क्रूर-अक्रूर रूप में पहचाना जाता है। क्रूरता “पर-पीड़ा” के रूप में स्पष्ट हुई हैं।
जीव जो दूसरे जीवों को पीड़ित करते है अथवा मांसाहार करते हैं, उन्हें क्रूर जीव कहते हैं। क्रूरता का कुछ जीवों में होना देखा जाता है। कुछ जीवों में कभी क्रूरता और कभी अक्रूरता भी देखने को मिलती है। जीवों में आहार विधि अथवा भयभीत विधि से पर-पीड़ा कृत्य संपन्न होते हुए देखने को मिलता है। कुत्ते-बिल्ली में यही प्रवृत्ति देखने को मिलती है। ऐसे भयभीत विधि से हर जीव कहीं न कहीं पर-पीड़ा करता हुआ देखने को मिलता है। इस प्रकार भयवश पर-पीड़ा स्पष्ट होता है। “आहार के लिए” पर-पीड़ा बाघ, शेर जैसे जीवों में स्पष्ट है।
अस्तित्व में कम से कम दो अंशों का परमाणु गठन का संभावना रहता ही हैं।
अस्तित्व में सभी अवस्थाओं में उन-उनकी परंपरा अक्षुण्ण (निरंतर) रहती ही हैं। पदार्थावस्था से न्यूनतम अवस्था (परमाणुओं का ना होना जैसे सूर्य) में कोई धरती होती नहीं है। पदार्थावस्था सहज धरती में ही चारों अवस्थाएँ प्रमाणित हो जाती हैं। हर अवस्था में परंपराएँ अपने अपने सिद्घांत से व्यवस्थित हैं ही। मानव को ही अभी तक अपनी मौलिक परंपरा को पहचानना शेष है।
“अस्तित्व में प्रकटन”- विकास क्रम, वियकस, जागृतिक्रम, जागृति
पदार्थावस्था में समृद्घ धरती ही प्राणावस्था में उदात्तीकृत (आगे की स्थिति में परिवर्तन) होती हैं। फलस्वरुप धरती पर हरियाली आरंभ होती हैं। क्रम से धरती समृद्घ होती हैं। पदार्थावस्था, प्राणावस्था के बीच रासायनिक प्रक्रियाएँ