(जीव = कर्म करते समय परतंत्र फल भोगते समय परतंत्र, भ्रमित मानव = (जीव चेतना) कर्म करते समय स्वतंत्र फल भोगते समय परतंत्र, जागृत मानव (मानव चेतना)= कर्म करते समय स्वतंत्र फल भोगते समय स्वतंत्र)।

वहीं मानव अपने में कर्म करते समय में स्वंतत्र हैं, फलस्वरुप स्वस्फूर्त विधि से नियंत्रित, व्यवस्थित रहने की आवश्यकता तथा अवसर रहते हुए अभी तक वह नियंत्रित नहीं हो पाया। कल्पना शीलता, कर्मस्वतंत्रता जैसी अद्भुत महिमा का मूल्यांकन नहीं हो पाया। कर्म स्वतंत्रता वश जीवन सहज शक्तियों आशा, विचार, इच्छाओं को आदि काल से मानव भ्रमवश दुरुपयोग करते आया। फलस्वरुप इस बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक इसके सदुपयोग विधि को शिक्षा में, प्रयोजन विधि को पहचाना नहीं गया। व्यवहार शास्त्र में इसकी सदुपयोग विधि पहचानने में नहीं आई, संविधानों में इसकी संरक्षण विधि समझ में नहीं आई, मूल्यांकन में विधि समझ में नहीं आई।

इन्हीं गवाहियों के आधार पर मानव परम्परा भ्रमित रहना स्पष्ट है। हर मोड़, मुद्दे पर विश्वासघात से ही दुकानें सजीं। इसकी भी गवाही वर्तमान ही हैं।

जैसे राजगद्दियाँ, धर्म गद्दियाँ आश्वासन देते है, व्यापारवाद जैसा आश्वासन देता है, वैसा व्यवहार में प्रमाणित होना अभी भी प्रतीक्षित रह गया है। इससे यह पता लगता है कि आदि मानव से अभी तक जो कुछ भी अंतरण हुआ, वह वस्तुओं की संग्रह सुविधा विधि और उसकी तादाद की सीमा में ही आज भी मानव मूल्यांकित हैं। सर्वाधिक संख्या में सभी मानव इसी संग्रह सुविधा के चौखट में दिखाई पड़ते हैं। कोई कोई अपवाद रूप ही इससे छूटे हो सकते हैं। और भी एक स्मरण आवश्यक हैं कि आदि काल से मानवों में छोटे-छोटे समुदाय परंपरा होना पाया जाता है, जिसमें अधिकतर अविश्वास रहा है।

किसी देश काल में विश्वास व्यक्त करने वाले कुछ संख्या में मिलेंगे और सर्वाधिक संख्या में क्षणिक विश्वास के आधार पर सांस लेते हुए आदमी को देखा जा सकता है। इस प्रकार वर्तमान में विश्वास संपन्न व्यक्तिन्यूनतम हैं। अधिकतम वर्तमान में प्रताड़ित व्यक्ति हैं।

इसको इन स्वरुपों में जाँचा जा सकता है :-

  • आदि मानव जैसा अभी भी अविश्वास पनप रहा है।
  • आदि मानव से अभी विश्वास अधिक हो रहा है?
  • आदि मानव से अभी अविश्वास बढ़ गया है?

इन बातों में बहुत ज्यादा पीछे न पड़ते हुए अवश्यमेव इस निश्चय पर आते हैं कि हम अभी जैसे मानव जाति में हैं, इन सभी परम्पराओं में भ्रम सर्वाधिक रूप में ही हैं। मानव में समाहित अमानवीयता का भय है ही एवम् इससे छूटना ही, हमारा प्रधान उद्देश्य है। अस्तु, विकल्प की आवश्यक रही आई। विकल्पात्मक आधार अस्तित्व ही हैं, जिसका प्रतिपादन हुआ हैं। अस्तित्व ही सह-अस्तित्व के रूप में विकास रूप स्पष्ट हैं। यही व्यवस्था अथवा नित्य व्यवस्था के रूप में समझ में आया हैं।

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