अब यह स्पष्ट हो गया कि विकल्पात्मक आधार सह-अस्तित्व है। इस आधार पर चिंतन करने वाला, समझने वाला, जीने वाला, प्रमाणित करने वाला मानव है। इसीलिए इसका नाम अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन है।
इस प्रकार हम इस जगह पर आते हैं कि सभी व्यक्ति मानवत्व सहित व्यवस्था है और व्यवस्था में भागीदार होने का अधिकार अक्षय शक्ति, अक्षय बल संपन्नता के रूप में सभी व्यक्तियों में देखने को मिलता है। इसी आधार पर हर व्यक्ति जागृत होने योग्य है। इसके लिए अनुकूल और सफलात्मक विधि से विकल्पात्मक जीवन ज्ञान (स्वयं को समझना), अस्तित्व दर्शन ज्ञान (सम्पूर्ण अस्तित्व, जो कुछ है उसे समझना), मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान (मानवीयता पूर्ण जीना समझना) के आधार पर विधिवत् विचारधारा एवम् समझदारी को संजोना एक आवश्यकता रहा है। इसी आधार पर “समाधानात्मक भौतिकवाद” मानव के सम्मुख प्रस्तुत हुआ। इस प्रकार सबको जागृत होने का अधिकार है। दूसरी तरफ विकल्पात्मक दर्शन और ज्ञान, सह-अस्तित्व पर आधारित है। उल्लेखनीय बात यहाँ यह है कि :-
1. सह-अस्तित्व में मानव अविभाज्य वर्तमान है।
2. अस्तित्व में मानव द़ृष्टा (देखने - समझने वाला) है।
इन आधारों पर अथवा इस नजरिये के आधार पर देखने की स्थिति में “मानव का मौलिक तर्क” भी पहचान सकते हैं। प्रयोजन सम्मत विश्लेषण, विश्लेषण सम्मत प्रयोजन, दूसरे तरीके से विवेक सम्मत विज्ञान व विज्ञान सम्मत विवेक ही मानव सहज मौलिक तर्क है। भ. व. (185 – 200)
मानव आचरण निश्चित होने की आवश्यता
सम्पूर्ण अभिव्यक्ति, सत्ता में संपृक्त प्रकृति के रूप में नित्य वर्तमान है। वर्तमान, त्रिकालाबाध सत्य है। व्यापक रूपी सत्ता में संपृक्त प्रकृति में ही जीवन है और जीवन में ही जागृति प्रमाणित होता है। यह एक सहज कार्य के रूप में प्रमाणित हो चुका है। इस धरती पर मानव, शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में प्रकाशमान है और अभिव्यक्ति शील हैं। विकास क्रम में संपूर्ण वनस्पति जगत प्राणावस्था के रूप में व्यक्त हैं। यह भौतिक वस्तु की महिमा हैं, यह समझ में आ चुका है।
विकास, परमाणु में होना देखा गया है। ऐसे परमाणुओं में, से चैतन्य पद में संक्रमित होने के उपरान्त ही ‘जीवन’ है।
यह ‘जीवन’ अपनी महिमा को जीवनी क्रम में संपूर्ण जीवों के रूप में दिखता है। जागृति क्रम में मानव भी जागृति पूर्वक एक अभिव्यक्ति है। इस प्रकार सत्ता में संपृक्त प्रकृति चार अवस्थाओं में व्यक्त है। इसका नामकरण पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था है। भ. व. (71-74)
प्रत्येक इकाई में जैसा पहले कहा गया-गाय, घोड़ा आदि में उन के स्वभाव को कम से कम उन-उन रचनाओं को शरीर आयु पर्यन्त स्थिर रखने के क्रम में ही वंशानुषंगीयता (वंश के अनुसार) स्पष्ट होती गयी। यह एक विलक्षण स्थिति सम्मुख होती हैं कि इस धरती पर मानव के अतिरिक्त सभी रचनाओं (अवस्थाओं) यथा पदार्थावस्था,