हर मानव अपनी पहचान प्रस्तुत करना चाहता ही है। हर मानव की पहचान समाधान समृद्घि अभय सहअस्तित्व रूप में ही पहचानना बनता है और पहचान कराना भी बनता है। इसी आधार पर पूरे मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद को समाधान, समृद्घि, अभय, सहअस्तित्व रूपी मानव लक्ष्य को सार्थक बनाने के अर्थ में प्रस्तुत किया गया है। मेरा विश्वास है हर मानव ऐसे ही अध्ययन का स्वागत करेगा।
यह पुस्तिका सर्वमानव शुभ के अर्थ में सम्प्रेषित है। सर्वशुभ के अर्थ में सहअस्तित्व स्वयं निरन्तर प्रभावशील है। सहअस्तित्व के वैभव में ही सम्पूर्ण मानव का शुभ समाया हुआ है। इस तथ्य का अध्ययन कराना उद्देश्य रहा है। हम स्वयं अध्ययन किये हैं। अतएव आपके सौभाग्यशाली वर्तमान के रूप में अनुभव करने के लिए सहायक होगा, ऐसा हमारा निश्चय है।
यह प्रबंध मानव को समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी पूर्वक मानव लक्ष्य, जीवन लक्ष्य को भागीदारी रूप में प्रमाणित करने के लिए प्रेरक है। यह सार्थक हो, सर्वसुलभ हो, मानव कुल अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था के रूप में सदा-सदा प्रमाणित होता रहे। यही कामना है। - व्य.ज. 234
मानव व्यक्ति के रूप में सदा शुभ चाहता है- यह प्रत्येक व्यक्ति में सर्वेक्षण पूर्वक समझ में आता है। व्यक्ति-व्यक्ति में शुभ के रूप में जीने की कला और विचार शैली के संबंध में मतभेद बना रहता है। यही मानव में अंतर्विरोध है अथवा अपेक्षा के खिलाफ बाह्य विरोध है। यह मानव सहज यर्थाथ नहीं है अपितु परंपरा का भ्रम है। परम्परा प्रचार और शिक्षा के रूप में सर्वाधिक प्रभावशील होती हैं अथवा प्रत्येक मानव को परंपरा में प्रभावित करने के उक्त दो तरीके समर्थ दिखाई पड़ते हैं। इन दोनों का यथार्थ पर आधारित रहना आवश्यक है। उन्माद, भ्रम, सुविधा, भोग- जैसे सम्मोहन के लिए ही सभी शिक्षा देते हैं और प्रचार करते आए हैं। इसी के साथ रहस्य और आस्था भी बनी रही है। इसलिए मानव के लिए आशित सुख, समृद्घि, समाधान और सुन्दरता संभव नहीं हो पाई।
समाधान और व्यवस्था अविभाज्य है। समाधान का धारक-वाहकता प्रत्येक मानव में आवश्यकता के रूप में देखने को मिलता है। व्यवस्था समग्रता के साथ ही प्रमाणित होता है। समाधान जागृति का द्योतक है। हर व्यक्ति जागृत होना चाहता है। जागृति का मार्ग प्रशस्त होना ही इसका एकमात्र उपाय है। परंपरा में जागृति का तात्पर्य: शिक्षा-संस्कार, व्यवस्था, संविधान में जागृत मानव का लक्ष्य, स्वरूप, कार्य और प्रयोजन स्पष्ट हो जाने से है। संस्कारों का मतलब स्वीकृति से ही है, अवधारणा से ही है। अस्तित्व में जागृत मानव के उद्देश्य से अवधारणा को देखा गया वह है-
- जीवन ज्ञान
- अस्तित्व दर्शन ज्ञान
- मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान
ये ही स्वीकारने के लिए वस्तुएँ हैं। मानव परंपरा में जागृति पूर्णता की वस्तु भी इतनी ही हैं। इन्हीं तीन बिंदुओं में इंगित परम सत्य वस्तु को स्वीकारने योग्य परम्परा ही मानव संस्कार पंरपरा है। उक्त तीनों बिंदुओं में इंगित वस्तु की उपयोगिता विधि, सदुपयोगिता विधि, प्रयोजनशील होने की विधि, अध्ययन की अर्थात् शिक्षा की मूल वस्तुएँ हैं। मानव परंपरा भी अस्तित्व में अविभाज्य वर्तमान है। प्रत्येक मानव जीवन और शरीर के संयुक्त साकार रूप में है। मानव स्वयं को शरीर मानने के आधार पर इन्द्रिय सन्निकर्ष (इंद्रियों द्वारा भोग इच्छायें) ही जीवन कार्य में केन्द्र बिन्दु बन जाते हैं।