• मानव ही दृष्टापद में है एवं इसे वैभवित, प्रमाणित, व्यवहृत करने योग्य इकाई है। अस्तु मानव ही कर्ता-भोक्ता होना भी पाया जाता है।

मानव ही प्रत्येक इकाई में अनन्त कोणों का दृष्टा, एक से अधिक इकाइयों के दिशा, काल और देश का दृष्टा, प्रत्येक एक में स्थिति गति का दृष्टा, प्रत्येक इकाई में अविभाज्य रूप में वर्तमानित रूप, गुण, स्वभाव, धर्म रूपी आयामों का दृष्टा, व्यक्ति, परिवार, ग्राम, देश, राष्ट्र और विश्व परिवार रूपी परिप्रेक्ष्यों का दृष्टा होना अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिन्तन सहित सह-अस्तित्व रूपी शाश्वत क्रियाकलाप क्रम में, परमाणु में विकास गठनपूर्णता, उसकी निरंतरता, चैतन्य पद में संक्रमण जीवनपद, जीवनी क्रम, जीवन जागृति क्रम, जागृति, मानवीयतापूर्ण मानव परंपरा और जीवन जागृति पूर्णता फलस्वरूप देव मानव, दिव्य मानव पदों का दृष्टा, कर्ता, भोक्ता होना पाया जाता है। इसी क्रम में स्पष्ट किए गये मानव पद में क्रियापूर्णता और दिव्य मानव पद में आचरण पूर्णता और उसकी निरंतरता का होना पाया जाता है। इस विधि से अस्तित्वमूलक मानव केन्द्रित चिन्तन की अवधारणाएं स्वयं स्पष्ट करता है कि पूर्ववर्ती दोनों विचारधारा से समाधान के अर्थ में भिन्न होना स्पष्ट है। अवधारणा का तात्पर्य ही अध्ययनपूर्वक धारणा के अनुकूल स्वीकृतियों से है। अर्थात्, हम मानव समाधान संपन्न होना चाहते हैं। -अ.श 27-29

अब सह-अस्तित्व दर्शन बनाम मध्यस्थ दर्शन, जीवन ज्ञान और मानवीयता पूर्ण आचरण का प्रतिपादन सार्वभौम व्यवस्था अखण्ड समाज के अर्थ में व्याख्या विश्लेषण सहित प्रस्तुत है। विगत चिंतन क्रम में मानव अभी तक योग संयोग से, अथक प्रयास से, सूझ बूझ तैयार कर पाया। इन सबके पश्चात जो जिज्ञासाएं, प्रश्न चिन्ह विविध प्रकार से समीचीन हैं, इन सबका उत्तर और समाधान अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन है क्योंकि अस्तित्व ही, सह-अस्तित्व के रूप में, नित्य समाधानित है। अस्तित्व में ही मनुष्य भी अविभाज्य है, जीवन भी अस्तित्व में अविभाज्य है। अस्तित्व में ही अपने “त्व’’ सहित, व्यवस्था के रूप में आचरण है। इन तीनों बिंदुओं को जानना-मानना, पहचानना और निर्वाह करना ही पूर्ण दर्शन, पूर्ण ज्ञान एवं पूर्ण आचरण का तात्पर्य है।

1.4 मानव में समाधान की आवश्यकता

हम मानव सदा से ही सुखी होना चाहते हैं। यह सबको कैसे उपलब्ध हो सकता है ? सोचने, समझने, स्वीकार करने अथवा मान लेने के आधार पर दो प्रकार के प्रयोग हो चुके हैं। पहला भक्ति विरक्ति से सुखी होने का प्रयास और प्रयोग लाखों आदमियों से सम्पन्न हुआ। दूसरी विधि सुविधा-संग्रह से सुखी होने के लिए अथक प्रयास करोडों मानव अथवा सर्वाधिक मानवों ने किया। इन दोनों विधियों से सर्वमानव का सुखी होना प्रमाणित नहीं हुआ। इसी रिक्ततावश इसकी भरपाई के लिए किसी विधि की आवश्यकता बन चुकी थी। इसी घटनावश उत्पन्न समाधान के लिए सह-अस्तित्ववादी नजरिया से ज्ञान, कर्माभ्यास और अनुभवमूलक विधि से अनुभवगामी पद्घति सहित प्रस्तुत हुए।

हर मानव सुखी होना चाहता है सुखी होने के लिए बौद्धिक समाधान आवश्यक है। समाधान के लिए समझदारी आवश्यक है। समझदारी का मूल स्वरूप सहअस्तित्व दर्शन ज्ञान, जीवन ज्ञान ही होना पाया जाता है। इसे लोकव्यापीकरण करने का आशा इस प्रस्तुति में समाया हुआ है।

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