हर व्यक्ति डूबे, घिरे हुए स्थिति को देखता ही है। हरेक - एक इसी प्रकार दिखती है। पारगामी होने का बिन्दु तभी पता चलता है, वस्तु में निहित ऊर्जा सम्पन्नता को, बल सम्पन्नता के रूप में देखा जाता है।

इसे इस प्रकार देख सकते हैं कि प्रत्येक वस्तु मूलत: परमाणु अंश, परमाणु अंशों से रचित परमाणु, अनेक परमाणु से रचित अणु, अनेक अणुओं से रचित रचनाएँ दिखते ही हैं। परमाणु अंश, परमाणु के रूप में गठित होने के क्रम में इन अंशों के परस्परता में निश्चित दूरी होना पाया जाता है। ये दूरियाँ स्वयं व्यापक वस्तु ही हैं। ऐसे परमाणु अंशों को भी अनेकानेक भाग-विभाग में कम से कम गणितीय विधि से विभाजन कल्पना कर ही सकते हैं। कितने भी विभाजन करें एक की संख्या (अंश) बढ़ती जायेगी, न कि किसी एक का नाश होगा। इस सहज क्रिया से यह पता चलता है, एक का वैभव नित्य है। एक के सभी ओर ऊर्जा (व्यापक) दिखाई पड़ती है। इस विधि से सत्ता रूपी ऊर्जा पारगामी है। यह स्वाभाविक ही स्पष्ट हो जाती है। यह बौद्घिक प्रक्रिया इसलिये आवश्यक है कि जड़-चैतन्य रूपी अनन्त प्रकृति में सत्ता पारगामी है और यही पारगामीयता सहज महिमावश हर वस्तुएँ अथवा प्रत्येक एक सत्ता में भीगा हुआ होना पाया जाता है। इस मुद्दे को पहले भी स्पष्ट किया जा चुका है। अस्तु, अस्तित्व में व्यापक सत्ता विद्यमान है, आप हमारे आँखों में देखने को मिलती है, इसका भाग-विभाग होता नहीं है और जीवों का उत्पत्ति अव्यक्त विधि से होता नहीं है। अस्तित्व में परमाणु ही जीवन पद में गठन पूर्णता पूर्वक वैभवित है। जीने की आशा का उद्गमन जीवन में, से, के लिये होता ही रहता है। यही ऊर्जा आशा रूप में प्रगट है क्योंकि जीवन अक्षय बल - अक्षय शक्ति सम्पन्न है, इस बात को पहले स्पष्ट किया जा चुका है।

इसी के साथ पहले यह भी स्पष्ट किया है कि गठनपूर्ण परमाणु पर रासायनिक-भौतिक दबाव-प्रभाव प्रभावशील होता नहीं है। रासायनिक-भौतिक वस्तुओं का दबाव-प्रभाव, इन्हीं के आपस में प्रभावशील होना देखा गया है। यह निष्कर्ष स्वाभाविक रूप में धरती, वायु, जल को नियंत्रित रखने के लिये सद्बुद्घिदायी सूत्र है। इसी के साथ वन, खनिज का संतुलन, उसका उपयोग प्रयोजन को संतुलित रखने का प्रतिष्ठा, अधिकार (जिम्मेदारी) स्वाभाविक रूप में मानव से निर्गमित होता है और प्रमाणित होता है। यह सब जागृति और उसकी प्रभावशीलन का क्रम और वैभव है। इस प्रकार अस्तित्व सहज रूप में जीवन एक गठनपूर्ण परमाणु होना, जिसमें ही मन, वृत्ति, चित्त, बुद्घि, आत्मा रूपी जीवन बल, आशा, विचार, इच्छा, ऋतंभरा और प्रमाण रूपी जीवन शक्तियाँ (अविभाज्य रूप में) प्रमाणित होते हुए देखा गया है। अध्यात्म का परिभाषा सभी आत्माओं का आधार रूप में इंगित होना पाया जाता है क्योंकि सत्ता पारगामी है। (अध्यात्म को ही परमात्मा, ईश्वर, चेतना संज्ञा है।– व्य.द., अध्याय १)

अस्तित्व में अनुभव विधि से यह तथ्य सुस्पष्ट हो जाता है कि जीवन एक गठनपूर्ण परमाणु है, इसमें मध्य में एक ही अंश कार्यरत है। सत्ता पारगामी होने के कारण, पदार्थ सत्ता को घेर नहीं पाता। इसका साक्ष्य यही है, किसी भी एक दूसरे के साथ भार बंधन का मूल में पाये जाने वाले चुम्बकीय धारा संबंध क्षेत्र से मुक्त होने के उपरान्त शून्याकर्षण स्थिति में स्पष्ट हो चुकी है। ऐसे स्थिति में हर वस्तु अपने ही गति और मात्रा के परिसीमन में निरंतरता को प्राप्त किया रहता है, जैसे यह धरती, सौर व्यूह है। यहाँ उल्लेखनीय तथ्य इतना ही है, व्यापक वस्तु भाग-विभाग होता नहीं है और इन चारों अवस्थाओं की प्रकृति अथवा किसी एक अवस्था की प्रकृति व्यापकता में से किसी एक अंश को घेर लेने में समर्थ नहीं है। इसीलिये इकाइयाँ सभी ओर से सीमित रहती हैं, ऐसे सीमाएँ व्यापक वस्तु में घिरा हुआ ही दिखाई पड़ता है। इस तथ्य से यह भी इंगित हुआ और स्पष्ट हुआ है कि सत्ता में प्रकृति अविभाज्य है और वर्तमान है।

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