मानवीय स्वभाव, मूल्य
‘धीरता’ अर्थात् न्याय के प्रति निष्ठा और दृढ़ता से है। ‘वीरता’ न्याय के प्रति निष्ठा रखते हुए, उसमें (दूसरों में भी) निष्ठा स्थापित करना है। वीरता को स्थापित करने में उसमें जितनी भी बाधाएं है, उसका निवारण करना है, यही वीरता का प्रमाण है। समझदारी सहित अनुभव बल, विचार शैली, जीने की कला ही धीरता, वीरता, उदारता, और दया, कृपा, करुणा का प्रमाण है। यही न्याय व समाधान सहित किया गया, सम्पूर्ण अर्पण-समर्पण भी है। दया अर्थात् पात्रता के अनुरूप वस्तु को सुलभ करने की क्रिया-कलाप है। कृपा अर्थात् वस्तु हो पात्रता न हो ऐसी स्थिति में पात्रता को स्थापित करने की क्रिया है। करुणा अर्थात् वस्तु और पात्रता दोनों न हो, ऐसी स्थिति में उसे उपलब्ध कराने की सहज क्रिया है।
चरित्र :
स्वधन, स्वनारी / स्वपुरुष तथा दया पूर्ण कार्य-व्यवहार विन्यास है।
- स्व-धन प्रतिफल, पारितोष, पुरस्कार के रूप में प्राप्त धन है।
- स्व-नारी या स्व-पुरुष विवाह पूर्वक प्राप्त, दाम्पत्य पति-पत्नी सम्बंध है।
- दयापूर्ण कार्य-व्यवहार के सम्बन्ध में, पहिले कहा जा चुका है।
नैतिकता
नैतिकता मानव कुल में तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग और सुरक्षा सहज प्रमाण है। सदुपयोग से सुरक्षा, सुरक्षा से सदुपयोग सहज है। निपुणता कुशलता पूर्वक तन-मन के नियोजन से उत्पादित वस्तुओं में कला व उपयोगिता मूल्य स्थापित होता है। फलस्वरूप वस्तुओं का उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता का सूत्र पांडित्यपूर्वक स्वयं स्फूर्त विधि से उदय होता है। धन का सदुपयोग रूप, शरीर पोषण, संरक्षण और समाज गति में अर्पित-समर्पित होने की क्रिया है। जिनके पोषण के अर्थ में वस्तुओं का अर्पण-समर्पण किया जाता है, उनकी सुरक्षा सहज है। जो अर्पण करता है, उनके द्वारा सदुपयोग है। उसके लिए अर्पण करने वाले को सदुपयोग संतुष्टि मिलती है तथा धन की सुरक्षा होती है।
इस प्रकार धन की सार्थकता, समझ में आती है। तन का उपयोग, सदुपयोग मन के साथ सम्पन्न होता है। जीवंतता, मानसिकता सहित ही, शरीर संचालित होना पाया जाता है, मानसिकता का सदुपयोग तभी हो पाता है जब जीवन जागृत होता है इतना ही नहीं, मानसिकता, जीवंतता सहित ही, धन का भी सदुपयोग, सुरक्षा, समझ में आती है। समझदारी के अर्थ में ही परिणामों का मूल्यांकन होता है।
शरीर की जीवंतता और मानसिकता का मूल रूप जीवन और उसकी महिमा है। जागृत जीवन ही तन, मन और धन का दृष्टा, कर्ता और भोक्ता है। इस प्रकार, मनुष्य से संपन्न होने वाली सभी क्रियाएं फल परिणाम है। जीवन मूलक अभिव्यक्ति, संप्रेषणा और प्रकाशन है। इस प्रकार मानसिकता पर आधारित तन, मन और धन के अनुरूप कार्यकलाप व उसके अनुसार परणितियां होना, सहज है। इस प्रकार मानवीयता है। स्वयं मानसिकता का सदुपयोग, निर्दिष्ट रूप में, स्वयं व्यवस्था तथा समग्र व्यवस्था में भागीदारी है।