रूप में सामरस्य पूर्ण नित्य व्यवस्था है। नियमित, नियंत्रित, संतुलित, जागृति, सहज ही व्यवस्था का प्रमाण है। यही स्वभावगति का स्वरूप है।

इस प्रकार पदार्थ अवस्था का नियमित रहना ही उसकी स्वभाव गति है। प्राण अवस्था का नियमित, नियंत्रित रहना ही उसकी स्वभाव गति है। जीवावस्था के सम्पूर्ण जीवों का नियमित, नियंत्रित व संतुलित रहना उनकी स्वभाव गति है। ज्ञानावस्था के मानव का नियमित नियंत्रित, संतुलित व जागृत रहना ही मानव की स्वभाव गति है। इस प्रकार मानव, का अपने में संयम व नियम को प्रमाणित करना जागृति पूर्वक सहज है। जागृति का तात्पर्य न्याय, धर्म, सत्य को प्रमाणित करना ही है। इसकी आवश्यकता है ही।

जागृत मनुष्य, व्यवसाय में नियमित रहता है। आचरण में नियंत्रित रहता है, विचारों में संतुलित व समाधानित रहता है अनुभव में जागृत रहता है। व्यवहार में प्रमाणित रहता है। समग्र व्यवस्था में भागीदार रहता है तथा स्वानुशासन के रूप में जागृति का सम्पूर्ण प्रमाण स्पष्ट होता है। इसे सर्व-सुलभ करना ही मानवीयता पूर्ण कार्य-क्रम है। - म.वि. 156–159

7.3 आत्मा, परमात्मा, अस्तित्व सम्बन्धी पूर्ववर्ती मान्यता

आत्मा, परमात्मा की चर्चा अनेक भांति से मानव कुल में फैल चुकी है। परमात्मा को व्यापक बताते हुए आत्मा को परमात्मा का अंश होने की परिकल्पना यह चर्चा का विषय रही, प्रमाणित वस्तु के रूप में धरती पर किसी ने देखा नहीं। जब हम सह-अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन विधि से अस्तित्व को देख पाये तभी यह पता लगा कि व्यापक वस्तु में अनंत वस्तु क्रियाशील है। ये सभी अनंत वस्तुएँ चार अवस्था में क्रियाशील हैं। चारों अवस्थाओं को प्रमाणित करने वाला वस्तु अनंत रूपी प्रकृति ही है। यही जड़ और चैतन्य रूप में विद्यमान वर्तमान है। व्यापक वस्तु रूपी सत्ता में ही अनंत वस्तु रूपी प्रकृति नियंत्रित, संरक्षित रहना देखा गया। इन सम्पूर्ण अनंत में चारों अवस्था का मूल प्रभेद तत्व परमाणु ही है अर्थात् विविध प्रकार से अभिव्यक्ति होने का मूल तत्व परमाणु है। परमाणु में समाहित एक से अधिक परमाणु अंशों के संख्या भेद से ही विभिन्न अवस्थाओं की अभिव्यक्ति सहज हो पायी। ये परमाणु, अणु व अणु रचित रचनाओं के रूप में रासायनिक, भौतिक क्रियाओं को सम्पन्न करते रहे हैं। परमाणु ही विकासपूर्वक गठन पूर्णता पद में वैभव होना देखा गया। इसी को चैतन्य इकाई (जीवन) नाम से इंगित कराया गया।

मानव परंपरा में जीवन अपने ही कल्पनाशीलता - कर्म स्वतंत्रता की ओर प्रवृत्त होते हुए जागृति की ओर बाध्य होता गया। जागृति जीवन सहज स्वीकृति रहता ही है। जागृति अर्थात् जानना-मानना-पहचानना-निर्वाह करना क्रियाकलाप ही है। यह प्रमाणित करने के लिये, ऐसे प्रामाणिकता को पाने के लिये, सर्वमानव इच्छुक रहा है। इन्हीं अस्तित्व सहज जीवन सहज आधारों पर समुदायगत संकीर्णताओं और वैज्ञानिक कर्मगत धरती के साथ किये जाने वाले अनिष्ट क्रियाकलाप के प्रति अस्वीकृति होते ही आया। जागृति के लिये नित्य विद्यमान अस्तित्व, जीवन और मानवीयतापूर्ण आचरण ही प्रधान बिन्दु रहा अथवा सम्पूर्ण बिन्दु रहा। भले प्रकार से देखने - परखने के उपरान्त यह पता चला अस्तित्व में व्यापक वस्तु है, इसे परमात्मा के नाम से इंगित कर सकते हैं। यह भाग-विभाग होता नहीं। यह सम्पूर्ण प्रकृति में पारगामी है। परस्पर प्रकृति के लिये पारदर्शी है। इन प्रमाणों को हर व्यक्ति समझ सकता है। सत्ता में

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