के लिये नर-नारियों का होना सह-अस्तित्व सहज अभिव्यक्ति है। ऐसा वैभव जीवावस्था और प्राणावस्था में भी दृष्टव्य है। मानव परंपरा में एवं जीव परंपरा में भी जीवन का समानता होना पाया जाता है। जीवन अपने स्वीकृतिपूर्वक स्त्री या पुरूष शरीर को चलाता है। जीवन के रूप में न तो स्त्री होते हैं न पुरूष होते हैं। जीवन सदा ही जागृति का प्यासा है। इसे प्रमाणित करने के लिये सदा-सदा ही प्रवृत्ति बनी ही रहती है। बारम्बार शरीर यात्रा का विफल होना भी जनसंख्या वृद्घि का कारण है। इसी के साथ-साथ जीव कोटि के शरीरों की संख्या का घटना भी एक कारण है। क्योंकि इस धरती पर जितने जीवन जीवनी क्रम में और जागृति क्रम और जागृति में प्रमाणित होने के लिये नियतिविहित नियंत्रण रहता ही है। उसमें से मानव परंपरा में केवल जागृति क्रम परंपरा के स्थिति में ही बारम्बार शरीर यात्रा की स्थिति बनी हुई है। इन आधारों पर स्पष्ट हो जाता है जागृतिपूर्वक ही मानव परंपरा का जनसंख्या नियंत्रण हो पाता है। जागृति परंपरा के उपरान्त स्वाभाविक रूप में हर जीवन जागृत होने के लिये योग्य परंपरा बना रहता है। इसलिये हर जीवन जागृत होना सहज संभव हो जाता है। जीवन जागृति के उपरान्त शरीर यात्रा की आवश्यकता नहीं रहती है या न्यूनतम हो जाती है। जागृति की अर्हता, अपेक्षा, संभावना स्त्री-पुरूषों के लिये समान रूप में विद्यमान है। इसीलिये इनमें समानता की परम्परा और उपलब्धि होती है।

  • मानव जागृतिपूर्वक ही ‘भ्रम ही बंधन का कारण होना’ समझ पाता है।
  • मानव ही जागृतिपूर्वक सम्पूर्ण भ्रम से मुक्त होता है।
  • मानव जागृतिपूर्वक ही सामाजिक होता है।
  • मानव जागृतिपूर्वक सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह करता है।- स.श. 129

(E) परिवार व्यवस्था एवं सार्वभौम मानवीय व्यवस्था में जीना

व्यवहार, मानव में सहज प्रक्रिया है कि मनुष्य, मनुष्य के साथ व्यवहार करता है। मनुष्येतर प्रकृति के साथ (मनुष्य) श्रम नियोजन पूर्वक उत्पादन करता है। मनुष्येतर प्रकृति के साथ श्रम-नियोजन पूर्वक उपयोगिता व कला मूल्य को स्थापित करना ही उत्पादन है। उत्पादन क्रम में नैसर्गिकता के सहज संतुलन को बनाए रखना जागृति का प्रमाण है। जीवन शक्तियों का आवश्यकता के अनुसार प्रवर्तन और परावर्तन होता है। एक से अधिक मनुष्यों के साथ जीने के क्रम में शरीर पोषण संरक्षण के आधार पर उत्पादन व निर्माण कार्य करना एक आवश्यकता रही है।

परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था का स्वरूप एक समझदार परिवार से सम्पूर्ण परिवार मिलकर विश्व परिवार का रूप है। प्रत्येक मनुष्य, सम्पूर्ण मनुष्यों से सम्बन्धित है। प्रत्येक एक, अनंत के साथ सम्मिलित है। अस्तित्व में सब, सबसे सम्बन्धित हैं। इन्हीं सम्बन्धों को पहचानना और मूल्यों का निर्वाह करना ही सामाजिकता है। विश्व परिवार ही, अखंड समाज है। विश्व परिवार व्यवस्था ही सार्वभौम व्यवस्था है। मानव सुखधर्मी है, परिवार की परिभाषा यह है कि परिवार के सभी सदस्य परस्पर परिवार गत उत्पादन कार्य में, परस्पर पूरक हैं। सम्बन्धों को पहचानना, मूल्यों का निर्वाह करना, यही विश्व परिवार की भी परिभाषा है। परिवार में व्यवस्था का प्रमाण, वर्तमान होता है।

मूलत:, मानव जागृति पूर्वक अपने मानवत्व सहित स्वयं से व्यवस्था है और समग्र व्यवस्था में भागीदार है। व्यवस्था के प्रकाशन, संप्रेषणा और अभिव्यक्ति का प्रमाण, मनुष्य की परस्परता में है। अस्तित्व ही, सत्ता में संपृक्त प्रकृति के

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