समाधान को प्रमाणित करने की विधि विधान, कार्य व्यवहार, फल, परिणाम और प्रयोजनों को लय बद्घ विधि से बोध करा देता है। अतएव लोक संवाद में इस मुद्दे पर चर्चा सम्पन्न हो सकती है कि अनुभवमूलक विधि से जागृति प्रमाणित करना है या भ्रमित रहना है।
“अधिष्ठान के साक्षी एवं अनुभव के रोशनी में स्मरण पूर्वक किये गए क्रिया-प्रक्रिया एवं प्रयास – प.सं, सं: 2008, पृ 15
- “श्रवण, मनन, निदिध्यासन* की संयुक्त प्रक्रिया अध्ययन है” (*निदिध्यासन = साक्षात्कार)। अ.द. सं २००४, पृ १९२
- “तदाकार होना: कल्पनाशीलता का नियोजन।हर शब्द का अर्थ है। उस अर्थ के स्वरूप में अस्तित्व में वस्तु है। शब्द के अर्थ के रूप में अस्तित्व में जो वस्तु इंगित है, उस अर्थ रूपी वस्तु में हमारा कल्पनाशीलता ‘तदाकार’ होना। ‘तद’ शब्द सच्चाई को इंगित करता है। सच्चाई के स्वरुप में कल्पनाशीलता हो जाना ही तदाकार, तद्रूप होना है”।संवाद, सं 2011, पृ 198, 203
- मानव में अध्ययन विधि का सूत्र, कल्पनाशीलता, प्रधान वस्तु है। इसका स्रोत जीवन सहज आशा, विचार, इच्छा का संयुक्त रूप में तत्पर रहना है। अध्ययन पूर्ण होने पर्यन्त कल्पनाशीलता की तृप्ति संभव न होने के कारण पुन:अध्ययन का कार्य मानव सहज है। मानव ही अध्ययन करने वाली इकाई है यह स्पष्ट हो चुका है। अध्ययन की परिभाषा ही है - अधिष्ठान सहज, अनुभव के साक्षी में स्मरण पूर्वक की गयी क्रिया-प्रक्रिया व प्रयास। इसका प्रमाण है, प्रत्येक मानव ही, जीवन को अनुभव मूलक विधि से प्रमाणित करता है। इस विधि से अनुभव के लिए अध्ययन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। - म.वि. 244–245
जांचना = अध्ययन, निरीक्षण, परीक्षण, सर्वेक्षण पूर्वक स्वीकृति = सिद्धान्त व प्रक्रिया पूर्वक सत्यता का उद्घाटन।
भ्रम से मुक्त होने के लिए सत्यासत्य के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों के दृढ़ संकल्प में परिणित होने की दृष्टि से शोध की अनिवार्यता है। - प.स. 221
उल्लेखित अनुभवों के आधार पर सम्पूर्ण जागृति अपने-आपसे जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयतापूर्ण आचरण ज्ञान में ही सम्पूर्ण है। इसका अभ्यास विधि सर्वप्रथम अनुसंधान दूसरा अध्ययन पूर्वक शोध, शोध पूर्वक