उनसे रचित रचनाओं से है। प्राणावस्था, जीवावस्था एवं ज्ञानावस्था का प्रकटन वैभव ही उदात्तीकरण का प्रयोजन है। इस प्रकार उदात्तीकरण का निश्चित स्वरूप और प्रयोजन स्पष्ट होता है।

उदात्तीकरण पूर्वक ही मानव शरीर भी एक रासायनिक रचना है और चैतन्य पद में संक्रमित परमाणु ही जीवन है यह अस्तित्व सहज है। इस जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव का होना और मानव परम्परा का होना पाया जाता है।

मानव परम्परा में जागृति ही प्रमाणों का आधार है। जीवन में जागृति मानव परम्परा में ही चरितार्थ रूप मानव का होना पाया जाता है। जीवन जागृति मानव शरीर द्वारा मानव परम्परा में प्रमाणित होती है। जीवन का तात्विक स्वरूप को गठन पूर्ण परमाणु चैतन्य इकाई के रूप में और रचनाओं को रासायनिक-भौतिक रूप (और रचना) में समझा गया है कि -

(1) जीवन अपने स्वरूप में गठनपूर्ण परमाणु चैतन्य इकाई है। गठनपूर्ण परमाणु का तात्पर्य है कि जिस गठन में सम्पूर्ण परिवेश मध्य में स्थित अंश अपने-अपने में तृप्त हो।

(2) जीवन परमाणु में, मध्य बिंदु में और आश्रित परिवेशों में जितनी-जितनी संख्या में अंश स्थित होना है वह पूर्ण हुआ रहता है। इसकी कार्य-योजना “सहअस्तित्व सहज” है मानव सहज कार्य-योजना जागृति को प्रमाणित करना ही है।

(3) गठन पूर्ण परमाणु चैतन्य पद में होता है जिसको जीवन नाम दिया गया है। ऐसे परमाणु अर्थात् जीवन परमाणु संक्रमण के साथ ही अणुबंधन मुक्ति, भारबन्धन मुक्ति और आशा बन्धन से युक्त होना पाया जाता है। यही बिंदु है - जीने की सहज आशा और आस्वादनापेक्षा उद्गमित रहती है।

(4) जीवन परमाणु अक्षय बल, अक्षय शक्ति सम्पन्न रहता है क्योंकि मात्रात्मक परिवर्तन जीवन परमाणु में होता नहीं। यह अणुबंधन मुक्ति के साथ ही आशा बन्धन महिमा स्वरूप देखा जाता है।

(5) जीवन परमाणु अपनी वर्तुलात्मक गति से अधिक कम्पनात्मक गति वैभव सम्पन्न होता है यह भारबन्धन मुक्ति का फलन है। यही आशाबन्धन के साथ ही प्रवर्तन विधियों को पहचानने-निर्वाह करने के कार्यक्रम को निर्धारित करता है। मनुष्येतर जीवों के कार्यकलाप (वंशानुषंगीयता के क्रम में) वंशानुषंगीयता का स्वरूप, कार्य, शरीर रचनानुषंगीय विधि से प्रमाणित रहता है।

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