जीवन में आशा-चयन और आस्वादन में; विचार-तुलन और विश्लेषण में; इच्छा-चिंतन (साक्षात्कार) और चित्रण में; बुद्धि में अवधारणा-बोध बुद्धि और संकल्प में; आत्मा-प्रमाण अनुभव और प्रामाणिकता में कार्यरत रहता है। इसका प्रमाण प्रत्येक जागृत मानव ही है।

(6) प्रत्येक जागृत मानव में ऊपर कहे गए सभी लक्षणों को अध्ययन करना संभव है इसमें और खूबी यही है कि जीवन सहज महिमा को स्वयं में अनुभव कर सकता है और मानव में ही सहज रूप में प्रमाणों को पा सकता है।

(7) जागृत मानव परम्परा में प्रत्येक मानव जागृति सहज प्रमाण होता है। सभी मानवों से यही अपेक्षा है, अपितु प्रत्येक मानव मनाकार को साकार करने वाला, मनः स्वस्थता का आशावादी और प्रमाणित करने वाल है। यह परिभाषा प्रत्येक मानव में देखने को मिलती है। मनाकार को साकार करने का तात्पर्य सामान्य आकाँक्षा जैसे - आहार, आवास, अलंकार सहित समृद्धि का अनुभव करने की आकाँक्षा और महत्वाकाँक्षा जैसे - दूरश्रवण, दूरगमन, दूरदर्शन साधनों से संपन्न होने की कामना स्पष्ट होती है। मनः स्वस्थता का तात्पर्य जागृति सहज सुख, शांति, संतोष, आनंद और उसकी निरंतरता सहज स्थिति को समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व पूर्ण आचरण पूर्वक प्रमाणित करता है।

(8) मानवापेक्षित परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था क्रम में, सम्पूर्ण सामान्य आकाँक्षाएँ प्रमाणित होना एवं सुलभ होना संभव है। इसी के साथ महात्वाकाँक्षा संबंधी उपयोग, सदुपयोग, प्रयोजनशीलता भी प्रमाणित होना सहज है।

(9) जीवन सहज रूप में बल और शक्तियाँ अक्षय हैं, अविभाज्य हैं और शाश्वत् हैं। इनमें से बलों का नाम मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा और शक्तियों का नाम आशा, विचार, इच्छा, ऋतम्भरा और प्रामाणिकता दिया गया है। जीवन सहज बलों में संगीतीकरण ही मनः स्वस्थता का सम्पूर्ण स्वरूप है। शक्तियों में संगीतीकरण ही व्यवहार में प्रमाणित होने का सूत्र है। मानव परम्परा में परस्परता और व्यवहार एक सहज कार्यकलाप है। जीवन में अनुभव मनः स्वस्थता का परम है क्योंकि अनुभव सत्य में, से, के लिए है, उसका प्रमाण व्यवहार परम्परा में ही सार्थक होना संभव है। ऐसे बल में संगीतीकरण को देखा (समझा) गया है कि जागृत जीवन सहज क्रिया व आचरण के अनुसार वृत्ति के अनुरूप मन के कार्य करने की स्थिति में सुख मिलता है जिसका प्रमाण स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन तथा व्यवहार में सामाजिक तथा व्यवसाय में स्वावलम्बी होने से है। यह तभी संभव होता है जब मन

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