मिलता है। इसी को दूसरी विधि से कह सकते हैं कि अन्न वनस्पति रूपी प्राणावस्था का वैभव रासायनिक द्रव्यों की महिमा के रूप में वैभवित हुई है। सभी अन्न वनस्पतियाँ रासायनिक रचना के रूप में पाई जाती हैं। इसका मूल तत्व भौतिक वस्तुएँ हैं। भौतिक वस्तुओं का रूप अणुएँ हैं, अणुओं का स्वरूप है। अणुओं के मूल रूप में परमाणु ही है। परमाणुओं के मूल रूप में परमाणु अंश ही भौतिक वस्तुओं के रूप में दिखाई देते हैं। इस प्रकार भौतिक वस्तुयें रासायनिक द्रव्यों के रूप में, रासायनिक द्रव्य प्राण कोषा और कोशाओं से रचित रचनाओं के रूप में होती हैं।
प्राण कोषाओं से रचित सम्पूर्ण रचनाएँविरचना क्रम में पदार्थावस्था में परिवर्तित होते देखी जाती हैं। यही आवर्तनशीलता का प्रथम प्रमाण पूरकता के साक्ष्य के रूप में देखने को मिलता है। मानव शरीर और जीव शरीर भी प्राण कोशाओं से रचित हैं। इसकी विरचना भी अन्न वनस्पतियों की विरचना की तरह, पदार्थावस्था में परिवर्तित होने के क्रियाकलाप के सदृश्य दिखाई पड़ता है। इसी के साथ पदार्थावस्था और प्राणावस्था की तरह स्वदेज प्रकृति का भी इसी प्रकार परिणितियों से संपन्न रहना देखा जाता है।
स्वेदज संसार भौतिक वस्तु और रासायनिक द्रव्य सहज संयोग होता है। इनका आचरण न तो भौतिक वस्तुओं जैसा होता और न समृद्ध मेधस सम्पन्न शरीर रचना और जीवन के संयुक्त रूप में होने वाले आचरण जैसा। इसीलिए इसका नाम स्वदेज प्रकृति दिया गया है। इन्हीं रचनाओं में से मेधस प्रणाली का आरंभ होना पाया जाता है। यही क्रम से समृद्धि की ओर गतिशील रहता है क्योंकि समृद्ध मेधस सम्पन्न शरीर रचना इसी धरती में साक्षित हो चुकी है। इसके सामान्य लक्षण रस, मांस, मज्जा, हड्डी, नस, रक्त, चर्म संपन्न शरीर रचना में समृद्ध मेधस का वैभव जीवावस्था में वंशानुषंगीयता के रूप में प्रमाणित है और मानव संस्कारानुषंगीयता के रूप में प्रमाणित होता है। वंशानुषंगीयता में जीवन शरीरों के अनुरूप कार्यकलाप में संलग्न हो जाता है फलतः वंशानुषंगीय अभिव्यक्ति में जीवन का वैभव सम्बद्ध हो जाता है। दूसरी विधि से शरीर की रचना में भागीदारी के रूप में सम्बद्ध प्राण कोषाएँ निष्प्राण होकर पुनः ऋतु और ऋतु प्रभाव (शीत, उष्ण, वर्षामान का प्रभाव) के अनुसार पुनः सप्राणित होकर कार्य करती है। इसमें जितनी भी रचनाएँ है इनमें मेधस का शुभारंभ होते हुए भी समृद्ध न होने का प्रमाण स्पष्ट हो जाता है। इस प्रकार से ऐसी क्रियाएँ प्राकृतिक रूप में असमृद्ध मेधस की व्याख्या में स्पष्ट हो चुकी हैं।
उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बीसवीं सदी के दसवें दशक में वैज्ञानिक अनुसंधान, शोध, प्रयोग (ह्रास विधि सूत्र, यंत्र प्रमाण की महिमा) के साथ मानव शरीर की कोशाओं से ऐसे मानव शरीर