अध्ययन का साहस जुटा पाता है। इसी क्रम में प्रत्येक प्रजाति के वस्तु का अपनी परमाणुविक स्थिति में क्रियाशील होना पाया जाता है। परमाणु में ही, श्रम, गति, परिणाम व्याख्यायित होता है और परमाणु ही परिणाम का अमरत्ववश जीवन पद में संक्रमित होता है। परिणाम के अमरत्व के मूल में गठन पूर्णता ही प्रधान प्रक्रिया है। यह अस्तित्व सहज घटना है।
अस्तित्व ही नित्य वर्तमान और परम सत्य है। इस प्रकार सत्य में, से, के लिए ही विकास क्रम, विकास व जागृति सहज अभिव्यक्ति संप्रेषणा और प्रकाशन है। अस्तित्व अपने स्वरूप में सर्व-देश, सर्वकाल, सर्ववस्तु ही है। वस्तु का तात्पर्य वास्तविकताओं को प्रकाशित करता हुआ प्रमाण से है। सर्वदेश का तात्पर्य मूलतः सत्ता में सम्पृक्त प्रकृति है। रचना सम्पन्न प्रकृति में ही देश चिन्हित होता है। सत्तामयता को सर्वदेश इसीलिए कहना बनता है कि सम्पूर्ण प्रकृति का सत्तामयता में नियंत्रित, संरक्षित, ऊर्जा संपन्न और क्रियाशील होना वर्तमान में दिखाई पड़ता है। सम्पूर्ण प्रकृति की स्थिति-गति सत्ता में ही है। आवास को देश कहें तब सत्तामयता ही मूलतः देश के रूप में प्रमाणित है। रचना की अवधि रूपी विस्तार को देखने की स्थिति में सम्पूर्ण रासायनिक - भौतिक रचनाएँ, सीमित देश के रूप में हैं। इस प्रकार भी व्यापक सत्ता में परिमित (सीमित, विभक्त) वस्तुयें नित्य वर्तमान हैं यह समझ में आता है। इस प्रकार प्रकृति परिमित (सीमित) सत्ता अपरिमित (व्यापक) ‘वस्तु’ देश के रूप में अस्तित्व में स्पष्ट है।
परिमित वस्तुओं में देश विभाजन रेखा होना मान लिया जाता है, होता नहीं। जबकि व्यापक सत्ता स्वयं अखण्ड रूप में है अतः सत्ता ससीम चिन्हित नहीं होती। इसे कोई भी प्रयोग कर देख सकता है। इसका मूल तथ्य यही है - (1) सत्तामयता का सम्पूर्ण प्रकृति में पारगामी होना। (2) सत्तामयता का पारदर्शी होना। (3) व्यापक होना। परिमित वस्तुओं में विभाजन रेखाओं को मान लिया जाता है किन्तु ऐसा हुआ नहीं रहता। जैसे इस धरती पर अनेक देशों के नाम से भूखंडों का सीमाकरण मानव करता है। इसी के साथ यह भी देखा जाता है कि वह सीमाएँ धरती से विखंडित न होकर अखंड रहती है। यह धरती अपने वातावरण सहित संपूर्णता सम्पन्न इकाई है। सम्पूर्णता अपने में अखण्ड है। यह अखंडता निरंतर बनी ही रहती है। जब तक धरती अपनी स्थिति को बनाए रख पाती है। यह भी स्पष्ट हो चुका है कि यह धरती अपने में समृद्धि और संतुलन संपन्न होने के फलस्वरूप मानव के भी वैभव आवास योग्य हुई है। इसका साक्ष्य इस धरती पर मानव का होना ही है। इससे यह पता चलता है कि इस धरती की सहज सटीकता का अध्ययन करना भी एक अनिवार्य स्थिति है।