यह धरती अस्तित्व में अविभाज्य है और अनेक सौर व्यूहों में से एक सौर व्यूह के अंगभूत रूप में वैभवित है। इसी धरती पर मानव अपने को नैसर्गिकता सहित सुरक्षित रहना पाते ही आया। फलस्वरूप मानव अपनी कल्पनाशीलता, कर्मस्वतंत्रतावश सामुदायिक, आर्थिक, राजनैतिक, वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी को प्रयोग करते ही आया। ऐसे सभी प्रयोगों के फलस्वरूप संतुलित नैसर्गिकता से असंतुलित नैसर्गिकता की ओर गति स्पष्ट हुई। इस धरती के अधिकांश मानव ऐसे परिवर्तन से व्याकुल हुए ऐसा सुनने को मिलता है। इसका मूल तत्व मानव संचेतना विरोधी मानसिकता ही प्रधान कारण और कार्य रहा है। मानव का अध्ययन जिस प्रकार से अभी तक संपन्न हुआ, उसी के आधार पर मानव संचेतना विरोधी मानसिकता (संवेदनशील मानसिकता) को प्रोत्साहन मिला, जबकि संज्ञानशीलता के नियंत्रण में संवेदनशीलता को पहचानने की आवश्यकता रही। यह विफल रहा अतएव परिणाम नकारात्मक, मानव विरोधी रूप में प्रवर्तित हुआ। इसी प्रकार देव संचेतना, दिव्य संचेतना प्रकट होना सहज है।
मानव का सम्पूर्ण अध्ययन मध्यस्थ दर्शन में सपन्न किया गया। अस्तित्व दर्शन के आधार पर यथा पदार्थावस्था, प्राणावस्था, जीवावस्था और ज्ञानावस्था की सहज स्थितियों का अध्ययन किया गया। इसी क्रम में अस्तित्व में ज्ञानावस्था में मानव को पहचाना गया। ज्ञानावस्था का तात्पर्य दृष्टा पद प्रतिष्ठा में कर्ता, भोक्ता और पुनः दृष्टा के रूप में जीने के कार्यक्रमों सहित अभिव्यक्त, संप्रेषणाशील और प्रकाशित होने से है। यही जागृति है।
अस्तित्व में “परमाणु में विकास” पूरकता, संक्रमण, जीवन, जीवनी क्रम, सकारात्मक समझ, पद्धति, प्रणाली, दिशा की ओर जीने का कार्यक्रम रूपी परिवार मूलक स्वराज्य और स्वानुशासन रूपी स्वतंत्रता को विधिवत अध्ययन किया गया है। साथ ही साथ अस्तित्व में विकास, पूरकता, उदात्तीकरण, भौतिक-रासायनिक रचनाओं और विरचनाओं का भी अध्ययन किया गया। इस प्रकार जीवन, जीवन जागृति क्रिया और भौतिक-रासायनिक क्रियाओं को सांगोपांग अध्ययन करने के उपरान्त पता चला कि संक्रमण, जीवन, जीवन जागृतिक्रम, जागृतिपूर्णता तथा उसकी निरंतरता पूर्वक मानव परम्परा नित्य वैभवशील होना समझा गया। सभी मानव अभी तक जागृति क्रम में स्थित जीवन और रासायनिक-भौतिक रचना सहज शरीर के संयुक्त रूप में प्रत्येक नर-नारी है। इन तथ्यों के आधार पर सहज मानव “ज्ञानावस्था की इकाई” का पहचान सहित नाम दिया गया है।