जिम्मेंदारी को हर मानव द्वारा निर्वाह करने की आवश्यकता को उजागर किया है। जिसकी आवश्यकता सहअस्तित्व सहज विधि से भावी मानव ही सार्वभौम आचरण, सार्वभौम ज्ञान और सार्वभौम दर्शन का धारक-वाहक है। प्रत्येक मानव सार्वभौमता की अपेक्षा में ही है यह प्रमाणित हो जाता है। इसी के पक्ष में मानवीयतापूर्ण आचरण, अस्तित्व दर्शन और जीवन ज्ञान प्रस्तावित है। इस क्रम में मानव का अपने अभीष्ट अर्थात् अभ्युदय को सम्पूर्ण विधि से प्रमाणित करने की आशा, विचार, इच्छा और संकल्प है। ऐसी स्थिति के लिए ही मानव का अध्ययन जीवन ज्ञान के आधार पर सुलभ हो गया है। इस “मानव संचेतनावादी मनोविज्ञान” में जागृत जीवन क्रियाकलाप का सत्यापन है।
पुत्री-पुत्र का संबंध भी माता-पिता संबंध के समान आशय को रखता है। ऊपर किए गए विश्लेषण से परस्पर मतान्तर होने का सम्पूर्ण कारण विश्लेषित हो गए हैं। सभी सम्बंधों के मूल आशय में समानता है यथा समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व मानव सहज अपेक्षा है सर्वतोमुखी समाधान पूर्वक ही सदा-सदा सुखी होना पाया जाता है तथा कार्यकलापों में (अर्थात् निर्वाह कार्यकलापों में) विविधता का होना स्वाभाविक है। यही विविधताएं जीने की कला के रूप में ख्यात होती है।
मूल आशय सहज सार्थकता के आधार पर की गई सभी प्रकार की निर्वाह व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी सम्बंधों और मूल्यों के निर्वाह रूप में ही प्रमाणित हो जाती है। मूल्यों का निर्वाह ही सम्बंधों को पहचानने का प्रमाण है। मूल्य मूलतः जीवन सहज बल की ही अभिव्यक्ति, संप्रेषणा है। इसमें अनुभव बल ही प्रधान कार्य, क्रिया वस्तु है। जागृति पूर्णता के रूप में अनुभव, व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होना पाया जाता है। यही नित्य विश्वास के रूप में ही व्यक्त होता है। इसका प्रयोजन और कार्य रूप वर्तमान में व्यवस्था और व्यवस्था में भागीदारी ही है। व्यवस्था अर्थात समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व मानव सहज अपेक्षा है।
सर्वतोमुखी समाधान पूर्वक ही सदा-सदा सुखी होना पाया जाता है, विश्वास सहज कार्य व्यवहार रूप में सम्बंधों का पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन, उभयतृप्ति व संतुलन ही है। विश्वास केवल सत्य में, से, के लिए होता है। अस्तित्व ही परम सत्य है। जीवन ज्ञान परम सत्य है। मानवीयता पूर्ण आचरण परम सत्य होना पाया जाता है। इसे चरितार्थ रूप देने की अभिलाषा से ही मानव संचेतना को पहचाना गया है। अस्तित्व में मानव का वैभव अथवा स्वराज्य को