विद्वता माना जाता रहा है। अभी इस दशक में बहुतायत लोगों में यह स्वीकृति विकसित हो चुकी है (1) स्मृति विद्वता नहीं है। (2) पुस्तकें विद्वता नहीं है (3) विज्ञान विद्वता नहीं है। कुछ विज्ञानी इस पक्ष में है कि सम्पूर्ण विज्ञान और तकनीकी में पारंगत होने के बाद भी श्रेष्ठ समाज का प्रणेता न हो पाने, परिवार सहज संगीत और समाधान रूपी लय से वंचित रहने के आधार पर विज्ञान मानव संतुष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं है - ऐसा मूल्यांकित किए हैं। इसके मूल में यह भी विश्लेषण आता है कि भौतिकी विधि से किए गए सूक्ष्म अनुसंधान के उपरान्त भी मानव और जीवन व्याख्या और सूत्र से रिक्त है। इसका खेद भी वैज्ञानिक व्यक्त करते हैं और कुछ विज्ञानी यह भी कहते हैं कि जो कुछ भी विकास होना है वह इसी विधि से होना है और सूक्ष्मतम अनुसंधानों से जितनी भी काली दीवालें सम्मुख हैं वे दूर हो जायेंगी। सर्वेक्षण से यह पता लगता है कि विज्ञान परस्त सभी आदमी, विज्ञान से ही “प्रकृति रूपी सत्य समझ में आता है” - ऐसा दावा करते हैं। 200 वर्ष की अवधि में ही 50% से अधिक विज्ञानी (इतना ही नहीं) श्रेष्ठ प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थियों में से 50 50 प्रतिशत से अधिक लोग आज की स्थिति में काली दीवालों को भांप लिए हैं क्योंकि वैज्ञानिक प्रयोग किये जाते हैं एवं उससे प्राप्त फल, परिणाम को अंतिम नहीं माना जाता है। अंतिम सत्य को समझा हुआ विज्ञानी मानव के सम्मुख प्रस्तुत नहीं हुआ है। विज्ञान विधि से हटकर अनुसंधान करने का आधार ही न रहने की स्थिति में परम्परा सहज (की) गति में घुल जाते हैं अथवा मिल जाते हैं अथवा दब जाते हैं। इन तीनों स्थितियों में अतृप्ति की पीड़ा बनी ही रहती है। इस कुण्ठाग्रस्त बिन्दु के उत्तर में अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन पूरकता,उदात्तीकरण, रचना-विरचना और विकास, संक्रमण, जागृति, प्रामाणिकता सहज सूत्रों से पारंपरिक धाराओं से हटकर शोध करने का एक अवसर प्रदान करता है।

कोई समुदाय परम्परा सार्वभौम न हो पाने की स्थिति में ही जातिवाद, नस्लवादी, रंगवादी, भाषावादी, पूजापाठ, अभ्यासवादी, सम्प्रदायवादी मानसिकता के अतिरिक्त, वर्गवादी मानसिकता के आधार पर भी “करो, न करो” वाला कार्यक्रम प्रकारान्तर से सभी संप्रदायों में बना रहता है। जीवन सहज रूप में प्रत्येक मानव में सार्वभौमता ही अपेक्षित है। इसी के आधार पर समुदाय परंपराओं में मानव जिसे स्वीकारता है उन्हीं की संतानें उसे नकार देती हैं। कहीं-कहीं परंपराएँ जिसे नकार देती हैं मानव उसे स्वीकार कर लेता है। इस प्रकार पीढ़ी से पीढ़ी में शोधात्मक और विद्रोहात्मक विधियों से प्रकाशन होते आया है। इस प्रकार प्रत्येक संबंध कुछ काल के बाद परस्परता में कुछ सार्वभौमता और उसका भरोसा बनते तक ऐसे शोध और विद्रोह भावी हो गए हैं। इसीलिए अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन समझदारी, ईमानदारी,

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