5. जागृति व आचरण
जागृति जीवन में, आचरण मानव में
मानव जीवन और शरीर का संयुक्त रूप है। निरंतर सुखी होने के अर्थ में मानव का लक्ष्य समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाणित होना ही है। इस सदी के अंत में मानव जागृत है अथवा जागृति के लिए इच्छुक और प्रयत्नशील है या आवश्यकता को महसूस करते हुए लक्ष्य व दिशा विहीन है। दिशा मानवीयतापूर्ण आचरण ही है अथवा आवश्यकता को महसूस करने, प्रयत्नशील होने और जागृत होने के योग्य है।
जीवन में अविभाज्य मन में होने वाली 64 क्रियाएँ
1. भक्ति 2. तन्मयता
भक्ति : भजन और सेवा की संयुक्त अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन क्रियाकलाप को भक्ति के नाम से जाना जाता है। भजन का तात्पर्य भय से मुक्त होने के क्रियाकलाप से है। इसका सकारात्मक स्वरूप विश्वास पूर्ण विधि से कायिक, वाचिक, मानसिक, कृत, कारित, अनुमोदित प्रणालियों से किया गया क्रियाकलाप।
सेवा का तात्पर्य है आवश्यकता, उपकार, कर्तव्य, दायित्व प्रणालियों से किया गया कार्यकलाप। इसमें सेवनीय वस्तु, विश्वास और सभी मूल्यों के साथ परावर्तित रहता है। ऐसी सहजता और विश्वास निरंतरता की पुष्टि है। यह तन्मयता का भी आधार है। तन्मयता रसों में तदाकार होना पाया जाता है। सम्पूर्ण मूल्य ही रस स्वरूप हैं जिनका आस्वादन मन में होना एक स्वाभाविक क्रिया है।
तन्मयता = सम्यक निष्ठा के लिये निश्चित लक्ष्य एवं दिशा हेतु निर्देशन विधि से जागृति सहज प्रभाव में अभिभूत होना तन्मयता हैं।
विश्वास एक साम्य मूल्य है। सम्पूर्ण सम्बंधों में सहज विश्वास ही वर्तमान में सुख पाने की विधि है। निरंतर समझदारी सहित आवश्यकताओं, उपकारों, कर्तव्यों, दायित्वों में भागीदारी को निर्वाह करने के क्रम में विश्वास प्रमाणित होना पाया जाता है। यह निरंतर उत्सव के स्वरूप में स्पष्ट है। ऐसा विश्वास पूर्ण होने के क्रम मे जागृति ही इष्ट है। इष्ट के साथ ही भक्ति का प्रवाह