होना पाया जाता है। ऐसा बहने वाला विश्वास का एक स्वाभाविक वातावरण अथवा प्रभाव क्षेत्र बनना सहज है, फलतः तन्मयता प्रमाणित होना पाया जाता है।

भक्ति सहज अभिव्यक्ति जागृति गामी विधि से अथवा जागृति क्रम विधि से भास, आभास, प्रतीति और जागृति पूर्ण विधि से प्रतीति, अनुभूति व उसकी निरंतरता दोनों स्थितियों में तन्मयता, तारतम्यता और उपादेयता स्पष्टतया समझ में आता है। भय मुक्ति जागृति पूर्णता के साथ ही प्रमाणित होना पाया जाता है। जागृति प्रत्येक मानव का इष्ट है। इष्ट सहज रूप में ही इष्टानुषंगीय रूप में ही भक्ति पूर्ण क्रियाकलाप सम्पन्न होता है। भक्ति पूर्णता अस्तित्व में अनुभव मूलक विधि से ही सार्थक है। भक्ति पूर्णता सहज प्रमाण मानवीयता पूर्ण आचरण व्यवहार एवं कार्य है।

भक्त, भक्ति और भाव (मूल्य) जागृति सहज कार्य व्यवहार व सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी करना ही है। इनमें सहज अविभाज्यता और उसकी अभिव्यक्ति ही भक्ति सहज पराकाष्ठा है। जीवन और शरीर के संयुक्त रूप में मानव का स्वरूप है। भक्ति जीवन जागृति सहज कार्य है। जीवन का भक्ति स्वरूप होना तथा इष्ट और भक्ति में नित्य सामरस्यता और अविभाज्यता का होना ही मौलिकता है।

इसी के साथ मौलिकता अर्थात् मूल्य रूपी विश्वास, इष्ट रूपी जागृति और मन में विश्वास ही मौलिकता है। यही सुख और सुख की निरंतरता का सूत्र हो पाता है। इस प्रकार भक्ति और तन्मयता जागृत जीवन सहज वैभव के रूप में स्पष्ट होती है। इसकी अभिव्यक्ति,संप्रेषणा, प्रकाशन, मानव परम्परा में प्रमाणित होता है। भक्ति, सम्पूर्ण निष्ठा की अभिव्यक्ति है। इसी तथ्य में इसकी आवश्यकता समाई रहती है इसीलिए प्रत्येक मानव निष्ठा को स्वीकार करने का इच्छुक रहता ही है।

सम्यक निष्ठा के लिए निश्चित दिशा, गम्य स्थली अथवा लक्ष्य का निर्देशन आवश्यक है। इस विधि से लक्ष्य जागृति सहज प्रभाव में अभिभूत होने से है। अभिभूत होना तन्मयता है। इसका स्रोत जीवन में केन्द्रीय अथवा जीवन केन्द्र में स्थित मध्यस्थ क्रिया रूपी आत्मा तथा अस्तित्व में अनुभव सहजता ही है। अस्तित्व में अनुभव सहज निरंतरता जागृत जीवन में, से, के लिए सहज है। जागृति पूर्वक ही प्रत्येक मानव यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता सहज रूप में जानना - मानना, पहचानना - निर्वाह करना प्रमाणित होता है। इसी आधार पर भक्ति का स्पष्ट प्रयोजन उसकी अभिलाषा रूप में मानव परम्परा में सार्थक होता है।

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