इसका तात्पर्य यही हुआ कि भक्ति, निर्भ्रमता अर्थात् जागृति पूर्णता सहज प्रयोजित होने में उत्सव है और निर्भ्रमता पूर्वक भक्ति नित्य उत्सव है ही। जागृति अथवा भ्रम मुक्ति के पक्ष की समझ में स्पष्टता और व्यवहार में प्रमाण होना भी निष्ठा का आधार बन पाता है। फलस्वरूप भक्ति चरितार्थ (स्पष्ट) हो जाती है। इसका मतलब यही हुआ कि अभ्यास विधि में निष्ठा की परम आवश्यकता है। सभी प्रकार से किया गया अभ्यास का लक्ष्य जीवन जागृति और व्यवहार में प्रमाण है। इस कारण जागृति के अनंतर भक्ति सहज निरंतरता और नित्य उत्सव होता ही है।
यथार्थता, वास्तविकता, सत्यता ही अस्तित्व सहज मौलिकताएँ है। इनके प्रमाणीकरण क्रियाकलाप मानव कुल में विश्वास पूर्वक ही निष्ठा सहित सम्पन्न हो पाती है। अस्तित्व सहज सत्यता, सहअस्तित्व सहज वास्तविकता और जीवन सहज यथार्थता मे निष्ठा का होना एक आवश्यकता एवं सार्थकता है। इसी क्रम में जीवन जागृति सहज रूप में होने वाली अस्तित्व में अनुभूति एवं उसकी निरंतरता, जागृति की निरंतरता के आधार पर मन में निष्ठा का होना सार्थक होता है। जागृत जीवन सहज प्रमाणिकता में निष्ठा होना मौलिक प्रयोजन है। सर्वतोमुखी समाधान में निष्ठा होना भक्ति सहज प्रयोजन है। अस्तित्व सहज परम सत्य में निष्ठा होना भक्ति सहज सार्थकता है। मानवीयतापूर्ण आचरण में निष्ठा का होना भक्ति सहज कार्य है। भक्ति सहज निष्ठा का कोई सार्थक आधार विकसित मानव ही हो पाता है। ऐसी स्थिति में जागृति विधि क्रम स्थापित होना संभव है।
अन्य प्रतीकों के साथ जिन संबंधों में निष्ठा करने के संकल्प से भक्ति का नाम लिया जाता है उस प्रतीकात्मक विधि से अनेकानेक लोग लगने के उपरान्त भी परिवार, समाज व व्यवस्था सहज व्यवहार रूप में प्रमाणित होना संभव नहीं हुआ। इस विधि में जीवन जागृति और भक्ति सहज व्यवहार प्रमाण प्रमाणित नहीं हो पाता है क्योंकि जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण में पारंगत होना ही भक्ति पूर्वक प्रमाणित होने का आधार है। जीवन जागृति विधि से ही भक्ति सहज प्रमाण स्थापित होना संभव है। जागृति ही जीवन का एक मात्र लक्ष्य होने के कारण जीवन ही जागृति सहज प्रमाणों को प्रस्तुत करने के लिए समर्थ है। जीवन जागृति पूर्वक ही निष्ठा में नित्य उत्सव हो पाता है। स्वयं में भक्ति का आधार जागृति स्वरूप में ही है। इसीलिए और किसी भी अवलम्बन से जागृति लक्ष्य को पाना संभव नहीं हो पाता है क्योंकि जागृति लक्ष्य का अध्ययन होते ही जागृति के लिए निष्ठा जीवन सहज रूप में स्वीकृत हो जाती है। भक्ति का आधार भी जीवन में समाहित है। भक्ति रूपी क्रियाकलाप की सम्पूर्ण अहर्ता जीवन में ही समाहित