का) प्रभाव क्षेत्र सहज प्रभावों की स्वीकृति है। ऐसी मान्यताओं का प्रयोजन सामाजिक होना पाया जाता है। ऐसी ममता सामाजिकता सहज सूत्र, वैभव और प्रयोजनों के साथ उत्सवित रहती है यही सार्थक उदारता का प्रवर्तन है। इसके पूर्वानुक्रम विधि से प्राप्त ममता शिशुकाल के अनंतर अभिभावकों का अपेक्षा में परिवर्तित होना आरंभ होता है। ऐसे परिवर्तन कौमार्य अवस्था से ही जागृति की ओर दिशागामी होने के रूप में पाया गया है। पूर्वानुक्रम विधि से मन में प्राप्त होने वाली मान्यता सहज ममता शरीर यात्रा पर्यंन्त कार्यरत रहना पाया जाता है। पूर्वानुक्रम विधि से ही मनन पूर्वक मान्यताएँ स्थापित हो पाती हैं, फलतः मानव परम्परा के लिए उपकारी और सार्थक सिद्ध होती हैं।
ममता अभिन्नता के अर्थ में चरितार्थ होती है। जागृति विधि से प्राप्त मान्यताएँ संतानों में अपने जैसे ही जागृत व्यक्ति के रूप में परिवर्धित होने के अर्थ में पोषण कार्यों को सम्पन्न करता है फलतः सार्थक हो जाता है। शुभ सहज के स्वरूप में जागृति न होते हुए भी मानव शुभाकाँक्षा करता है। ममता सहज प्रभाव, भले ही अभिभावक भ्रमित क्यों न रहते हों, जब तक ममता का भाव (मूल्य) रहता है, तब तक उदारता पूर्ण चरित्र प्रकाशित रहता है। उदारता का आचरण स्वयं स्फूर्त कार्य है।
उदारता पूर्वक जब मानव अपने आचरण को प्रस्तुत करता है, तब अपने पास जो कुछ भी तन, मन, धन रूपी अर्थ होता है उसे प्रसन्नता और उत्सव के रूप में ही अर्पण-समर्पण करना प्रमाणित होता है। यह प्रधानतः मात्रात्मक रूप में अधिकाधिक व्यक्त हो पाता है। इसमें अर्थात् ममता सूत्र में निष्ठा पूर्णतया अभिव्यक्त होती है। ममतावश पोषण कार्य भरपूर सम्पन्न होता है और संरक्षण कार्य सहजता से संपन्न हो जाता है। इस प्रकार प्रधानतः पोषण कार्यों में ममता सहित मातृत्व को और ममता सहित संरक्षण कार्यों को पितृ संबंध में होना पाया जाता है। पितृ संबंध संरक्षण पोषण रूप में ममता व उदारता मूल्य व मूल्यों के रूप में सम्पन्न होना पाया जाता है। ममता और उदारता मानव परम्परा में संतानों के साथ सहज ही वर्तमान होने वाला आचरण है।
5. सम्मान 6. सौहार्द्र
सम्मान :- (1) व्यक्तित्व प्रतिभा की स्वीकृति और उसका सन्तुलन सहज प्रकाशन (2) व्यक्तित्व एवं प्रतिभा सहज श्रेष्ठता की स्वीकृति निरन्तरता स्पष्टता।