रूपों का प्रतिबिंब संयोग होता हुआ सुरुप-कुरूप में वर्णन होता है। ज्ञानेद्रियों के कार्यों की स्वीकृति है।
जागृत जीवन में सभी इद्रियों के कार्य का अर्थ समझदारी के अनुरूप स्पष्ट होता है। समझदारी जागृत जीवन स्वत्व है। शरीर तंत्र सहित सभी अंग-अवयवों में समझदारी का स्थान नहीं हैं जबकि प्रत्येक मानव में समझदारी से ही सभी कार्य व्यवहार विन्यास सार्थक होता है।
मानव में जागृति सहज समझदारी का प्रमाण जानने-मानने का तृप्ति बिंदु है। प्रत्येक मानव जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन व मानवीयतापूर्ण आचरण सहज समझ पर विश्वास करता है। सम्मिलित रूप में अंग-अवयव परस्परता सहित रचना-विरचना क्रम में सम्पूर्ण भौतिक -रासायनिक इकाईयाँ कार्यरत तथा वर्तमान हैं। मानव शरीर, अन्य जीवों का शरीर और वनस्पतियाँ इसी धरती के रासायनिक-भौतिक वैभव के रूप में हैं, जिनमें रचना-विरचना कार्य संपन्न होता है।
जीवन को तात्विक रूप में समझने की जिज्ञासा हों ऐसी स्थिति में परमाणु में होने वाली विकास प्रक्रिया, उसके संक्रमण वैभव को भी जो चैतन्य इकाई के रूप में प्रतिष्ठित है, को सहज ही अध्ययन, अवधारणा में लाना एवं अनुभव करना आवश्यक है। फलस्वरूप जीवन संचेतना (संज्ञानशीलता, संवेदनशीलता) सहज वैभव पर विश्वास होना पाया जाता है। जीवन संचेतना प्रत्येक मानव में संपन्न होने वाली जानने- मानने ,पहचानने- निर्वाह करने के रूप में प्रमाणित है। जीवन सहज अक्षय बल, अक्षय शक्ति के रूप में दस क्रियाएँ प्रत्येक मानव में ज्ञात हैं। जैसे चयन-आस्वादन, विश्लेषण-तुलन, चित्रण-चिंतन, बोध-संकल्प, और अनुभव तथा प्रामाणिकता - ये दस क्रियाएँ हैं। जिसको निरीक्षण-परीक्षण पूर्वक हम समझते हैं। अस्तु, जीवन ज्ञान के फलस्वरूप हर मानव में स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान, प्रतिभा व व्यक्तित्व में संतुलन, व्यवहार में सामाजिक तथा व्यवसाय में स्वावलम्बी, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी सम्पन्न हो जाता है। जीवन ज्ञान के साथ अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण समाहित रहता है। जीवन ही शरीर को जीवन्त बनाए रखता है। जीवन में अविभाज्य क्रियाये है। जीवन एक चैतन्य परमाणु भार बंधन और अणु बंधन से मुक्त इकाई के रूप में होना पाया जाता है। ऐसे परमाणु में चतुर्थ परिवेशीय अंश का नाम है मन जितकी क्रिया है,चयन और आस्वादन एवं वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा यह भी परिवेशों के नाम है। मन जीवन में अविभाज्य क्रिया है। जीवन ही अनुभव रूपी संज्ञानशीलता को (जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन, मानवीयता पूर्ण आचरण सहज अनुभव) मन शरीरगत मेधस द्वारा प्रसारित करते