समुदाय चेतना मानव संचेतना में विलय हो सके। मानव में मानवीयता पूर्ण संस्कार पोषण बुनियादी कार्य है। प्रत्येक व्यक्ति में यह महत्वपूर्ण कार्य मां से आरंभ होता है यही मानव संस्कृति की अंकुरण क्रिया है। मानव जाति और धर्म, अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था रूपी सत्य को स्थापित करना मानव संस्कार है। संबंधों की पहचान, शिष्टता का अभ्यास मानव संस्कार है। मानव जाति, मानव में मानवीय संबंध, मानव समाज, मानवीय व्यवस्था (संविधान मानवीयता पूर्ण मानव का आचरण) के प्रति अवधारणाओं को स्थापित करना शिक्षा-संस्कार है।
आरंभिक अथवा बुनियादी कार्य माता-पिता अथवा अभिभावकों और बंधुओं से सम्पन्न होता है। दूसरा शिक्षा संस्थानों में दृढ़ होता है। राज्य व्यवस्था, संविधान पूर्वक पूर्ण एवं मूल्यांकित व प्रमाणित हो पाता है। इस प्रकार मां का पोषण कार्य शरीर, संस्कार, शिक्षा, व्यवहार, आचरण की बुनियाद है।
43. पिता 44. संरक्षण
संरक्षण :- जीवन जागृति के क्रम में निर्बाधता , सुगमता के अर्थ में है। संतान को, संतान के रूप में स्वीकार किये हो, ऐसी स्थिति में वे अभिभावक (अभ्युदय भावना सम्पन्न) अपने बच्चों का संरक्षण करते हैं यह एक सर्वसाधारण क्रिया है।
प्रधानतः पिता संरक्षण में, माता पोषण में सर्वाधिक रूप में प्रमाणित होते हैं या होना चाहते हैं। संरक्षण का प्रधान कार्य स्वास्थ-संयम, शिक्षा- संस्कार, संस्कृति-सभ्यता, आचरण और मूल्यों का आस्वादन हैं।
स्वास्थ्य संरक्षण :- सन्तान का संरक्षण शरीर और मानसिकता के अर्थ में स्पष्ट है। शरीर संरक्षण अभ्यास से, संतुलित आहार योजना से, रोग निवारण उपायों से संभव हो पाता है। मानवीय संस्कारों से, मानवीय शिक्षा से, मानवीयता पूर्ण आचरण से मानसिक संरक्षण सहज ही हो पाता है। जहाँ तक शरीर संरक्षण के क्रियाकलाप है वह सर्वाधिक लोगों को विदित हैं। यह यथा स्थिति होते हुए इसका सामान्य विचार करना आवश्यक है।
सन्तान के प्रति पिता का विश्वास सहज व सत्य वर्तमान होना पाया जाता है। अभिभावक, संतान संबंध को पहचानने मात्र से संबंध में विश्वास मूल्य जीवन सहज है। यह वैभव, ममता, वात्सल्यादि रूप में प्रमाणित होता है। यही मूल्यों के नाम से जाना जाता है। जीवन का अक्षय