बल व शक्ति सम्पन्न रहना ही जीवन सहज रूप में मूल्यों को प्रकाशित करता है। ऐसे प्रकाशन क्रम में संबंधों को पहचानना अनिवार्य स्थिति है।
संबंधों को मानव सर्वाधिक पहचानता है अथवा पहचान के क्रम में है। संबंधों को पहचानना जीवन का सर्वाधिक प्रयुक्ति है, जबकि निर्वाह करते समय शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में प्रयुक्त होना प्रमाणित है। जीवन विहीन शरीर से पहचान निर्वाह नहीं होता है। देखने, समझने व पहचानने वाला जीवन है।
स्व-शरीर सहित सम्पूर्ण वस्तुयें जीवन के लिए दृश्य हैं। इस कारण कल्पना के सहारे किसी संबंध की पहचान भले ही करें, निर्वाह के लिए शरीर का भी होना आवश्यक है। इसी क्रम में प्रत्येक अभिभावक का अपने संतान सहज संबंध को पहचानना,निर्वाह करना सहज प्रयुक्ति है। जीवन महिमा ही शरीर को जीवन्त बनाए रखती है। जीवंतता सहित ही संबंधों को पहचानने का प्रमाण निर्वाह करने के रूप में होता है।
अभिभावक जितना जागृत रहते हैं उसी के अनुरूप संतानों की सर्वतोमुखी सम्पदा का संरक्षण होना सहज है। शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ अभिभावक ही स्वस्थ संतानों को प्रस्तुत कर पाते हैं। स्वस्थ वे हैं जिनमें मानवीय संचेतना विकसित हो चुकी हो। समुदाय चेतना संपन्न व्यक्ति का मानसिक रूप से स्वस्थ होना संभव नहीं है। मानवतावादी विचार संपन्न मानवीयता पूर्ण आचरणरत मानव ही स्वस्थ मानस संपन्न होता है। अस्तु प्रत्येक मानव को, मानवीयता के प्रति जागृत रहना अनिवार्य है। यही स्वस्थ संतान को प्रस्तुत करने का सूत्र है। शरीर संरक्षण सामान्य रूप में निर्वाह होता है।
संस्कार नाम-जाति, धर्म, दीक्षा, शिक्षा सहज रूप में आवश्यक है। नाम संस्कार संबोधन के अर्थ में, जाति संस्कार - मानव जाति के अर्थ में, धर्म संस्कार मानव धर्म (सर्वतोमुखी समाधान) के अर्थ में, दीक्षा संस्कार जीवन जागृति, स्वानुशासन के अर्थ में सार्थक है। शिक्षा संस्कार पहले कहे चारों संस्कारों को सार्थकता प्रदान करते हुए -
(1) अखंड समाज सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी सहित
(2) स्वयं के प्रति विश्वास, श्रेष्ठता के प्रति सम्मान
(3) प्रतिभा और व्यक्तित्व में संतुलन का उदय।